लेबर लॉ में बड़े बदलाव पर उठी नाराजगी, एटक नेता दीपेश मिश्रा ने जताई चिंता

कोरबा।केंद्र सरकार द्वारा 29 पुराने श्रम कानूनों को समेटकर चार नई श्रम संहिताएँ लागू किए जाने के बाद श्रमिक संगठनों में गहरा असंतोष व्याप्त है। वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्यशर्त संहिता 2020 की अधिसूचना जारी होने के बाद देशभर में विरोध जताया जा रहा है। भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर लगभग सभी केंद्रीय श्रम संगठनों ने नए कानूनों को श्रमिक विरोधी बताया है।

एटक कोल फेडरेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दीपेश मिश्रा ने कहा कि नई श्रम संहिताओं ने कमजोर श्रमिकों को “मालिकों की दया पर” छोड़ दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने श्रमिक सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर दिया है।

उन्होंने बताया कि पहले 15–20 कर्मचारियों वाली फैक्ट्री पर फैक्ट्री एक्ट लागू होता था, लेकिन अब यह सीमा बढ़ाकर 100 कर दी गई है। इससे छोटे उद्योग पूरी तरह कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे।


इसी तरह, अभी तक 100 से अधिक कर्मचारियों वाली फैक्ट्री को बंद करने के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक थी, पर नए कोड में यह सीमा बढ़कर 300 कर्मचारी कर दी गई है। इसका मतलब है कि 300 से कम कर्मचारियों वाली इकाइयाँ बिना सरकारी मंजूरी बंद की जा सकेंगी।

वेतन संहिता 2019 पर बात करते हुए एटक नेता ने कहा कि इसमें न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, बोनस भुगतान अधिनियम और समान पारिश्रमिक अधिनियम को मिला दिया गया है।

उनका आरोप है कि समान वेतन देने का दावा करते हुए असल में मजदूरों के हित वाले कानूनों को “चालाकी से कमजोर” कर दिया गया है।

अभी तक न्यूनतम वेतन त्रिपक्षीय कमेटी ट्रेड यूनियन, कॉर्पोरेट और सरकार की भागीदारी के आधार पर तय होता था, लेकिन नए प्रावधानों में यह अधिकार केवल सरकारी नौकरशाहों को दे दिया गया है, जिससे मजदूरों की आवाज कमजोर हो जाएगी।

दीपेश मिश्रा का कहना है कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य ट्रेड यूनियनों पर नियंत्रण मजबूत करना है, और इसका सीधा असर मजदूरों के आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा अधिकारों पर पड़ेगा।