कोरबा।कोरबा जिले में नाबालिग बालक-बालिकाओं की गोपनीयता को सुरक्षित रखने के लिए पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब लापता या घर छोड़कर भागने वाले नाबालिगों के नाम, पते और अन्य पहचान से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। इस बदलाव के तहत एफआईआर में नाबालिगों की पहचान को व्ही-2, व्ही-3 जैसे कोड के माध्यम से गोपनीय रखा जा रहा है। यह नई प्रक्रिया इसी माह से लागू हो गई है।
गोपनीयता सुनिश्चित करने का प्रयास
इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य नाबालिगों की पहचान को सार्वजनिक होने से रोकना है ताकि उन्हें अपने कृत्यों के लिए अपमान का सामना न करना पड़े। पहले, कोरबा पुलिस द्वारा दर्ज की जाने वाली एफआईआर में नाबालिग का नाम, पिता का नाम, पता और उम्र स्पष्ट रूप से उल्लेखित होती थी। लेकिन अब, किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 74 के अनुपालन में, पुलिस ने नई कोडिंग प्रणाली अपनाई है। इस प्रणाली के तहत केस दर्ज कराने वाले को व्ही-1, पते को व्ही-2, और बच्चे के नाम को व्ही-3 या व्ही-4 जैसे कोड से संबोधित किया जा रहा है। इससे बच्चे की पहचान, उनके माता-पिता का नाम और निवास स्थान गोपनीय रहता है।
बाल संरक्षण आयोग के निर्देश पर कार्रवाई
बाल संरक्षण आयोग के कड़े निर्देशों के बाद पुलिस ने यह कदम उठाया है। पहले, लापता नाबालिगों के मामलों में दर्ज एफआईआर में सभी विवरण ऑनलाइन सार्वजनिक हो जाते थे। लेकिन अब, गोपनीयता बनाए रखने के लिए कोडिंग प्रणाली लागू की गई है। किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 74 के अनुसार, किसी भी नाबालिग की पहचान, जैसे कि नाम, पता, स्कूल या अन्य जानकारी, जो उनकी पहचान उजागर कर सकती हो, को मीडिया या अन्य संचार माध्यमों में प्रकाशित करना प्रतिबंधित है। इसका उल्लंघन कानूनी अपराध माना जाता है।
पॉक्सो एक्ट और निजता का संरक्षण
पॉक्सो एक्ट की धारा 23 भी नाबालिगों की निजता के उल्लंघन को रोकती है। कोरबा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे की पहचान, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, सार्वजनिक न हो। इससे बच्चों की निजता और प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। धारा 23(4) के तहत, इस नियम का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।
खोजबीन में माता-पिता की सहमति जरूरी
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इस प्रावधान के कारण कई बार खोजबीन में चुनौतियां आती हैं, खासकर जब माता-पिता सहयोग नहीं करते। यदि पुलिस नाबालिग की खोज के लिए इश्तहार या सूचना प्रकाशित करना चाहती है, तो माता-पिता से लिखित सहमति लेना अनिवार्य है। सहमति न मिलने पर किशोर न्याय बोर्ड या बाल कल्याण समिति से अनुमति ली जा सकती है।
बच्चों को मिलेगी राहत
एफआईआर में नाम-पते की कोडिंग से नाबालिगों को काफी राहत मिलेगी। इससे उनकी पहचान गोपनीय रहेगी और सामाजिक अपमान से बचाव होगा। बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड भी बच्चों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए सतर्क हैं। सरकार द्वारा समय-समय पर जारी निर्देश भी इस दिशा में कदम उठाने पर जोर देते हैं।
Editor – Niraj Jaiswal
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