कोरबा। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जनधन योजना, जो कभी लोगों की पहली पसंद थी, अब कोरबा जिले में चुनौतियों का सामना कर रही है। जिले में खुले 7 लाख 89 हजार 772 जनधन खातों में से लगभग 4 लाख खाते निष्क्रिय या बंद हो चुके हैं। इसका प्रमुख कारण खातों की समय पर केवाईसी (Know Your Customer) नहीं होना है। इस स्थिति ने सरकारी योजनाओं जैसे महतारी वंदन, किसान सम्मान निधि और अन्य हितग्राही योजनाओं की राशि डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से हस्तांतरित करने में बाधा उत्पन्न की है।
बंद खातों पर वित्त मंत्रालय का सख्त रुख
केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने बंद पड़े जनधन खातों को जल्द से जल्द चालू करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं। हाल ही में रायपुर से आए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के जनरल मैनेजर ने कोरबा में एक शिविर के दौरान 50-60 खातों को तत्काल चालू करवाया और इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई। जिला स्तर पर सभी बैंकों को शिविर आयोजित कर केवाईसी प्रक्रिया पूरी करने और खातों को पुनर्जनन के लिए सक्रिय करने के आदेश दिए गए हैं।
केवाईसी नहीं होना सबसे बड़ा कारण
2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद कोरबा जैसे आदिवासी बहुल और दुर्गम क्षेत्रों में जनधन खातों को बड़े पैमाने पर खोला गया था। इन खातों को जीरो बैलेंस के साथ शुरू किया गया था, जिसे कोविड-19 के दौरान भी लोगों ने उत्साहपूर्वक खुलवाया। हालांकि, बैंकिंग नियमों के अनुसार, प्रत्येक खाते की कम से कम 10 वर्ष में एक बार केवाईसी अनिवार्य है। कोरबा में अधिकांश ग्रामीणों ने इस प्रक्रिया को पूरा नहीं किया, जिसके चलते उनके खाते बंद हो गए।
लीड बैंक मैनेजर कृष्ण भगत ने बताया, “जनधन खाते 2014 के बाद खुले थे, और अब 10 साल पूरे हो चुके हैं। नियमानुसार, केवाईसी न होने के कारण अधिकांश खाते बंद हो गए हैं। वित्त मंत्रालय के निर्देशानुसार, सभी बैंक शाखाओं को शिविर लगाकर केवाईसी प्रक्रिया पूरी करने और खातों को चालू करने के लिए कहा गया है।”
सरकारी योजनाओं पर पड़ रहा असर
जनधन खातों का उपयोग केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे महतारी वंदन, किसान सम्मान निधि, तेंदूपत्ता संग्रहण बोनस, वृद्धा पेंशन, और धान की बोनस राशि को डीबीटी के माध्यम से हितग्राहियों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। बंद खातों के कारण यह राशि समय पर हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पा रही है, जिससे सरकार की योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में महतारी वंदन योजना के तहत 70 लाख हितग्राही हैं, जिनमें से कई के खाते बंद होने से राशि हस्तांतरण में देरी हो रही है।
बैंकों और बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट्स के सामने चुनौती
जिले में 29 सरकारी और निजी बैंक कार्यरत हैं, जिनकी 134 शाखाएं और 686 बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट्स (BC) हैं। ये बीसी दुर्गम क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएं प्रदान करते हैं। हालांकि, ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक पहुंचना आसान नहीं है। सीमित संसाधनों और जागरूकता की कमी के कारण केवाईसी प्रक्रिया को पूरा करना बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कुछ खातों में अनियमितता भी
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ लोगों ने एक ही परिवार में दो से तीन जनधन खाते खुलवाए थे, जो अब बंद हो चुके हैं। इसके बावजूद, कई खातों में सरकारी योजनाओं की राशि नियमित रूप से हस्तांतरित हो रही है, जिससे यह स्पष्ट है कि जनधन खाते अभी भी कई हितग्राहियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बैंकों को अब शिविर आयोजित कर और बीसी के माध्यम से ग्रामीणों तक पहुंचकर केवाईसी प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता अभियान और तकनीकी सहायता के जरिए इस समस्या का समाधान संभव है। यदि खातों को समय पर चालू नहीं किया गया, तो सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का लाभ हितग्राहियों तक पहुंचाने में और देरी हो सकती है।
Editor – Niraj Jaiswal
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