जिस चाक को छोड़ने वाले थे रामकुमार, उसी ने फिर घुमाई जिंदगी की रफ्तार                               

पीएम विश्वकर्मा योजना से मिला इलेक्ट्रॉनिक चाक और टूलकिट; पुश्तैनी हुनर को आधुनिक तकनीक का सहारा

कोरबा। मिट्टी को आकार देकर घड़े, सुराही, दीये, गुल्लक और खिलौने बनाने की कला रामकुमार प्रजापति को विरासत में मिली है। पीढ़ियों से कुम्हारी उनके परिवार की आजीविका रही, लेकिन पुराने चाक, सीमित उत्पादन और कम आमदनी ने इस पुश्तैनी काम का भविष्य मुश्किल कर दिया था। एक दौर ऐसा भी आया जब पाली विकासखंड के मादन निवासी रामकुमार ने कुम्हारी छोड़ने का मन बना लिया था। अब प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत मिले प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों ने उनके इसी हुनर को नई रफ्तार दी है।

रामकुमार के लिए पुराना हाथ वाला चाक सिर्फ औजार नहीं, पीढ़ियों की विरासत था। लेकिन इसे चलाने में मेहनत अधिक और उत्पादन कम होता था। बाजार की मांग पूरी करना मुश्किल था और आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए पर्याप्त आमदनी नहीं थी। मुश्किलें तब और बढ़ गईं, जब बाजार में सामान बेचते समय तेज आंधी से उनकी झोपड़ी क्षतिग्रस्त हो गई और दायां पैर चोटिल हो गया। काम प्रभावित हुआ तो आमदनी भी घटने लगी।

छोड़ने का मन बनाया, फिर मिला सहारा

इसी दौर में रामकुमार को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना की जानकारी मिली। उन्होंने आवेदन किया। उद्योग विभाग ने उनके पारंपरिक हुनर का चिन्हांकन किया और लाइवलीहुड कॉलेज में एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें 4 हजार रुपए का स्टायफंड भी मिला। योजना के तहत पीएम विश्वकर्मा पहचान पत्र और आधुनिक टूलकिट मिलने से उनके काम को नया आधार मिला।

अब हाथ से चलने वाले पुराने चाक की जगह इलेक्ट्रॉनिक चाक ने ले ली है। कम मेहनत में तेजी से मिट्टी को आकार देना संभव हो गया है। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ी है और बाजार की मांग के अनुसार अधिक सामान तैयार करने का अवसर मिला है। रामकुमार बताते हैं कि पहले चाक चलाने में काफी शारीरिक मेहनत लगती थी, अब वही काम अपेक्षाकृत आसानी से और कम समय में हो जाता है।

रामकुमार आज पाली क्षेत्र के अलग-अलग बाजारों में दुकान लगाकर अपने बनाए मिट्टी के उत्पाद बेचते हैं। वे योजना के तहत उपलब्ध ऋण सुविधा के अवसर का उपयोग कर कारोबार को आगे बढ़ाने और उत्पादन बढ़ाने की तैयारी में हैं।

मिट्टी से सिर्फ बर्तन नहीं, उम्मीद भी गढ़ रहे

रामकुमार कहते हैं कि पुराने औजारों और कम आमदनी के कारण उन्हें कभी लगा था कि पुश्तैनी काम छोड़ना पड़ेगा। अब प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरण मिलने से उन्हें इसी व्यवसाय को आगे बढ़ाने का हौसला मिला है।

रामकुमार की कहानी बताती है कि परंपरागत हुनर के साथ आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण जुड़ जाए तो पीढ़ियों पुरानी कला को नई दिशा मिल सकती है। कभी जिस चाक की रफ्तार थमती नजर आ रही थी, आज उसी चाक पर रामकुमार अपने परिवार की आजीविका के साथ भविष्य की उम्मीद भी गढ़ रहे हैं।