कोरबा। मिनीमाता हसदेव (बांगो) जलाशय में लागू ठेका व्यवस्था के विरोध में बांगो बांध से विस्थापित आदिवासी समुदायों एवं हसदेव जलाशय क्षेत्र की 22 पंजीकृत मछुआरा सहकारी समितियों के संयुक्त संगठन विस्थापित आदिवासी (हसदेव जलाशय) मछुआरा संघर्ष समिति के नेतृत्व में सोमवार को तानसेन चौक से कलेक्टर कार्यालय, कोरबा तक शांतिपूर्ण रैली निकाली गई। रैली में बड़ी संख्या में विस्थापित आदिवासी महिला-पुरुष मछुआरे शामिल हुए।
रैली के पश्चात प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा।
छत्तीसगढ़ किसान सभा ने आंदोलन का समर्थन करते हुए बांगो डेम से प्रभावित विस्थापितों को मत्स्य पालन एवं मछली पकड़ने का अधिकार देने की मांग की। किसान सभा ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने मांगें नहीं मानीं तो आंदोलन को सड़क तक ले जाया जाएगा।
मछुआरा संघर्ष समिति के संयोजक फिरतू बिझवार एवं कृष्णा कुमार ने बताया कि छत्तीसगढ़ मत्स्य नीति 2022 के तहत जलाशयों को ठेका प्रणाली पर देने से विस्थापित आदिवासी एवं पारंपरिक मछुआरा समुदायों का शोषण हो रहा है। जिन समुदायों की जमीन, जंगल और गांव बांगो बांध के कारण डूबे, आज उन्हीं को अपने ही जलाशय में ठेकेदारों के अधीन काम करने को मजबूर किया जा रहा है।
संघर्ष समिति के संयोजक सरबोध, दीपक मंझवार, धनसाय एवं रविन्द्र सिदार ने कहा कि मिनीमाता हसदेव जलाशय का क्षेत्र 2005 से पूर्व की पारंपरिक ग्राम सीमाओं में आता है, जिस पर वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआर) का वैध दावा बनता है। इसके बावजूद ग्राम सभाओं के प्रस्तावों की अनदेखी कर ठेका दिया गया है।
ज्ञापन में मछुआरा समुदाय के साथ हुई धमकी, अवैध वसूली एवं मछली जाल की जब्ती जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए जान-माल की सुरक्षा की मांग की गई। संगठनों ने स्पष्ट किया कि वे ठेका व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगे और ठेकेदारों के लिए काम नहीं करेंगे।
छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं सूरजपुर के पूर्व विधायक भानु प्रताप सिंह ने रैली में शामिल होकर आंदोलन का समर्थन किया और प्रशासन से ठेका व्यवस्था पर तत्काल रोक, ग्राम सभा के अधिकारों की मान्यता, रॉयल्टी आधारित सामुदायिक मत्स्य व्यवस्था लागू करने तथा मछुआरा समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
किसान सभा के प्रदेश संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने कहा कि 1980 के दशक में बांगो बांध निर्माण से 58 आदिवासी बहुल गांव पूर्णतः डूब गए थे। विस्थापितों को आजीविका के रूप में मत्स्य पालन का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बाद में ठेका व्यवस्था लागू कर विस्थापितों को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर मजदूर बना दिया गया। यदि सरकार ने मांगें नहीं मानीं तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
आंदोलन को सीटू के प्रदेश महासचिव एस.एन. बैनर्जी, किसान सभा के दीपक साहू एवं दामोदर श्याम ने भी समर्थन दिया।
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