एनटीपीसी कोरबा में सीएसआर नीति पर सवाल: 2600 MW बिजली उत्पादन, पर आसपास के गांवों में आज भी अंधेरा!

कोरबा।देश की अग्रणी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) जहां एक ओर 2600 मेगावाट बिजली उत्पादन कर रही है, वहीं दूसरी ओर उसके आसपास बसे कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अंधेरे में जीने को मजबूर हैं।

यह विरोधाभास एनटीपीसी की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

एनटीपीसी की स्थापना के समय यह उद्देश्य स्पष्ट किया गया था कि बिजली उत्पादन के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, कौशल विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं वंचित वर्गों के उत्थान पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सीएसआर के तहत तीन-स्तरीय संरचना बनाई गई, जिसमें कॉर्पोरेट स्तर, स्टेशन स्तर और आसपास के ग्रामों में सामाजिक विकास कार्य शामिल हैं।

हालांकि कोरबा एनटीपीसी प्रबंधन के कॉर्पोरेट और स्टेशन स्तर के संचालन पर फिलहाल कोई सीधा प्रश्नचिह्न नहीं है, लेकिन सीएसआर की तृतीय संरचना यानी आसपास के ग्रामों में किए जा रहे कार्यों से स्थानीय आबादी लंबे समय से असंतुष्ट बनी हुई है। यही कारण है कि एनटीपीसी-कोरबा संयंत्र प्रबंधन की उपलब्धियों के बावजूद उसके खाते में लगातार अपयश जुड़ता जा रहा है।

गहन चिंतन-मनन के बाद यह तथ्य सामने आया है कि इस असंतोष के पीछे मुख्य वजह कोरबा परियोजना के अंतर्गत जनसंपर्क शाखा में पदस्थ कुछ अधिकारियों की लापरवाही, गैर-जिम्मेदाराना रवैया और असंवेदनशील व्यवहार है।

आरोप है कि संवादहीनता की स्थिति इतनी गंभीर है कि संबंधित अधिकारी न तो समस्याओं पर ध्यान देते हैं और न ही आमजन की बात सुनने के लिए फोन उठाने की जरूरत समझते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक उपक्रम के सफल संचालन के लिए तकनीकी दक्षता के साथ-साथ संयमित, सौम्य और प्रभावी संवाद शैली अत्यंत आवश्यक होती है। लेकिन कोरबा एनटीपीसी में जनसंपर्क से जुड़े कुछ विभागों के भोंडे और गैर-जिम्मेदार व्यवहार ने पूरे परिसर की छवि को प्रभावित किया है।

अब सवाल यह है कि क्या एनटीपीसी की सीएसआर गतिविधियां सिर्फ कागजों और आंकड़ों तक सीमित रह गई हैं, या वास्तव में जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए प्रबंधन गंभीर पहल करेगा? आसपास के गांवों की उम्मीदें अब ठोस कार्रवाई की ओर टिकी हैं।