कोरबा। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) की गेवरा माइंस के विस्तार क्षेत्र में रोजगार, पुनर्वास और मुआवजे की मांग को लेकर भू-विस्थापितों का प्रदर्शन गुरुवार सुबह हिंसक हो गया।
लगभग 80 विस्थापितों ने लाठियां लेकर माइन क्षेत्र में घुसने का प्रयास किया, जिससे सीआईएसएफ के डिप्टी कमांडेंट गंभीर रूप से घायल हो गए। स्थिति बिगड़ने पर जवानों को आत्मरक्षा में बल प्रयोग का आदेश दिया गया, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों को चोटें आईं।
घटना सुबह करीब 10 बजे की बताई जा रही है। एसईसीएल प्रबंधन और सीआईएसएफ के बीच सुरक्षा व्यवस्था का समझौता होने के कारण माइन क्षेत्र में पहले से ही सीआईएसएफ के जवान तैनात थे। पूर्व चेतावनी के मद्देनजर जवानों ने प्रदर्शनकारियों को एक निश्चित क्षेत्र में रोकने के लिए ह्यूमन चेन बना रखी थी। लेकिन विस्थापितों ने सीआईएसएफ जवानों से धक्का-मुक्की शुरू कर दी और गाली-गलौज की।
इसी दौरान डिप्टी कमांडेंट गिर पड़े और उनके पैर में गंभीर चोट लग गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने जवानों को धक्का देकर गिराने का प्रयास किया, जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
इस घटना ने मौके पर तनाव बढ़ा दिया। जवानों का गुस्सा भड़क उठा और आत्मरक्षा के सिद्धांतों के तहत उन्होंने मोर्चा खोल दिया। सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शनकारी दो समूहों में बंटे थे एक शांतिपूर्ण था, लेकिन दूसरा उग्र होकर आगे बढ़ने पर अड़ा। इसलिए जवानों को स्थिति के हिसाब से कार्रवाई करनी पड़ी। लाठीचार्ज में कई ग्रामीण घायल हुए, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है।
घायल डिप्टी कमांडेंट और अन्य जवानों का मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) कराया गया है। पुलिस इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर देगी।
प्रदर्शन छत्तीसगढ़ किसान सभा के नेतृत्व में हो रहा था।
विस्थापितों का कहना है कि माइन विस्तार के कारण उनके गांव प्रभावित हुए, लेकिन वर्षों से रोजगार, बसावट और उचित मुआवजा नहीं मिला। घटना के बाद आक्रोशित प्रदर्शनकारी दीपका थाने पहुंचे और सीआईएसएफ अधिकारियों पर अभद्र व्यवहार का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की।
स्थानीय प्रशासन ने स्थिति शांत करने के लिए समझाइश दी, लेकिन भू-विस्थापितों का आंदोलन जारी रहने के संकेत हैं।
एसईसीएल ने इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त करने की तैयारी चल रही है।
यह घटना कोयला क्षेत्रों में विस्थापन से जुड़ी समस्याओं को फिर से उजागर करती है, जहां आर्थिक विकास और स्थानीय अधिकारों के बीच टकराव आम हो गया है।
Editor – Niraj Jaiswal
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