छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर में वीरांगना बिलासा देवी की गाथा जनश्रुतियों, लोकगाथाओं और पांडुलिपियों में दर्ज एक अमर कहानी है। यह कथा केवल कल्पना नहीं, बल्कि देवार समुदाय की मौखिक परंपरा में जीवित एक ऐतिहासिक सत्य है, जो बिलासा को नाविक (केवटिन) से कहीं अधिक, एक लोकनायिका के रूप में स्थापित करती है।
प्रख्यात शोधकर्ता और साहित्यकार डॉ. अलका यादव ने घुमंतु समुदायों और जनजातियों के बीच गहन शोध कर बिलासा की गाथाओं को जीवित रखने का प्रयास किया है।
उनके अनुसार, ये परंपराएँ केवल इतिहास नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक आत्मा और पहचान का हिस्सा हैं।
इतिहासकार भी मानते हैं कि बिलासा की वीरता को लोकगीतों से निकालकर अकादमिक और लिखित रूप में संरक्षित करना आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ियाँ छत्तीसगढ़ में महिला शौर्य की गौरवशाली विरासत को समझ सकें।
बिलासा देवी की गाथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है और हमारी धरोहर को जीवित रखती है।
Editor – Niraj Jaiswal
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