दीवाली की रौनक बढ़ाने को तैयार कुम्हार: कोरबा में जोर-शोर से बन रहे मिट्टी के दीए, चाइनीज लाइट्स से कड़ी चुनौती

कोरबा। दशहरा के बाद अब कोरबा में दीपावली की तैयारियां जोर पकड़ रही हैं। बाजार रंग-बिरंगी लाइटों से सज रहा है, लेकिन परंपरागत मिट्टी के दीए की मांग भी कम नहीं है। अच्छी कमाई की उम्मीद में कोरबा के कुम्हार परिवार रोजाना चाक पर सैकड़ों दीए बना रहे हैं। कोरबा शहर के साथ-साथ कटघोरा, चैतमा, पाली और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में कुम्हार दीपोत्सव के लिए दीए और मिट्टी की कलाकृतियां तैयार करने में जुटे हैं। हालांकि, चाइनीज दीयों और लाइट्स की बढ़ती लोकप्रियता और बढ़ती महंगाई से कुम्हारों की कमाई पर असर पड़ रहा है।


कुम्हारों की मेहनत और उम्मीदें
कुम्हार परिवार सुबह से देर रात तक चाक पर दीए, मिट्टी के बर्तन और सजावटी कलाकृतियां बना रहे हैं। सीतामणी के एक कुम्हार ने बताया, “मैं 10 साल की उम्र से चाक चला रहा हूं। यह कला मुझे परिवार से विरासत में मिली है। इस बार हमने दीवाली के लिए हजारों दीए बनाए हैं, उम्मीद है कि अच्छी बिक्री होगी।” दीए बनाने की प्रक्रिया में मिट्टी लाने, उसे गूंथने, चाक पर आकार देने, धूप में सुखाने और फिर भट्टी में पकाने की लंबी प्रक्रिया शामिल है।

कुम्हारों का कहना है कि मेहनत ज्यादा है, लेकिन मुनाफा कम हो रहा है। बढ़ती महंगाई के कारण मिट्टी, लकड़ी और अन्य सामग्री की लागत बढ़ गई है, जिससे उनकी कमाई प्रभावित हो रही है।

चुनौतियां और चिंताएं
कुम्हारों को सबसे बड़ी चुनौती बाजार में सस्ते चाइनीज दीयों और इलेक्ट्रिक लाइट्स से मिल रही है। एक कुम्हार ने कहा, “चाइनीज दीए सस्ते हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता हमारे दीयों जैसी नहीं। फिर भी लोग सस्ते दामों की वजह से उन्हें खरीद लेते हैं।” इसके अलावा, नई पीढ़ी का इस पारंपरिक पेशे से दूर होना भी चिंता का विषय है। कुम्हारों ने बताया कि मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम होने के कारण युवा इस काम को छोड़ रहे हैं। सीतामणी के एक बुजुर्ग कुम्हार ने कहा, “पहले चाक को हाथ से घुमाना पड़ता था, अब इलेक्ट्रिक मोटर ने काम आसान किया है। लेकिन भट्टी में दीए पकाना अभी भी चुनौतीपूर्ण है। अगर सरकार आर्थिक मदद दे, तो इस कला को बचाया जा सकता है।”

बाजार में दीयों की सजावट
कोरबा के बुधवारी बाजार और मुड़ापार क्षेत्र में दीयों की दुकानें सजने लगी हैं। आने वाले दिनों में ट्रांसपोर्ट नगर और इतवारी बाजार में भी दीए बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे। कोरबा में बने दीए स्थानीय हाट-बाजारों के साथ-साथ जिले के विभिन्न विकासखंडों में भी भेजे जा रहे हैं। कुम्हारों ने बताया कि दीवाली के दौरान दीयों की मांग सबसे ज्यादा होती है, और वे इसे भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। कुछ कुम्हार कच्चे दीए बेच रहे हैं, जबकि कुछ उन्हें पकाकर बाजार में उतार रहे हैं।


कुम्हारों की मांग और भविष्य
कुम्हारों ने सरकार से मिट्टी के बर्तनों को पकाने के लिए आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण की मांग की है, ताकि यह कला अगली पीढ़ी तक पहुंच सके। उन्होंने सुझाव दिया कि स्थानीय हाट-बाजारों में कुम्हारों के लिए विशेष स्टॉल और सब्सिडी की व्यवस्था होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी के दीयों को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान और स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन जरूरी है, ताकि चाइनीज उत्पादों का मुकाबला किया जा सके।

दीवाली के इस मौसम में कोरबा के कुम्हार न केवल परंपरा को जीवित रख रहे हैं, बल्कि अपनी मेहनत से घर-घर रौशनी बिखेरने की तैयारी में जुटे हैं।