महापौर के हस्तक्षेप से रुकी परसाभाठा चौक की अतिक्रमण हटाओ कार्रवाई, यातायात अव्यवस्था और दुर्घटना का खतरा बढ़ा

कोरबा-बालकोनगर।बालकोनगर के परसाभाठा चौक पर अतिक्रमण हटाने के लिए नगर निगम की कार्रवाई को उस समय झटका लगा, जब महापौर संजू देवी राजपूत ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई रोक दी। इस घटना ने निगम की साख पर सवाल उठाए हैं और अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद किए हैं। परिणामस्वरूप, पहले से ही अव्यवस्थित यातायात और दुर्घटना का खतरा अब और बढ़ गया है।

परसाभाठा चौक: अतिक्रमण और जाम का गढ़

परसाभाठा चौक, जिसे चंद्रशेखर आजाद चौक के नाम से भी जाना जाता है, लंबे समय से अतिक्रमण की चपेट में है। सड़क के दोनों किनारों पर दुकानों और ठेलों का कब्जा, भारी वाहनों की आवाजाही, और नो-पार्किंग जोन में खड़ी गाड़ियां यातायात को अवरुद्ध करती हैं। यह चौक रूमगरा और रिसदी की ओर जाने वाले भारी वाहनों, बसों, टैक्सियों और बालको कर्मियों के आवागमन का प्रमुख मार्ग है। पैदल यात्रियों के लिए जगह न होने और कमजोर पुलिस निगरानी के कारण जाम और हादसों का खतरा बना रहता है।

चंद्रशेखर आजाद चौक की दुर्दशा

चौक पर स्थापित स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की आदमकद मूर्ति के आसपास भी अतिक्रमण और गंदगी का आलम है। इसकी बदहाली को देखते हुए नगर निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय ने हाल ही में क्षेत्र का निरीक्षण कर अतिक्रमण हटाने और चौक के सौंदर्यीकरण के निर्देश दिए थे।

क्या हुआ घटनाक्रम?

3 सितंबर 2025 को सुबह नगर निगम की टीम ने परसाभाठा चौक पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की। नोटिस के बावजूद दुकानदारों द्वारा जगह खाली न करने पर निगम की टीम ने कुछ तंबुओं को हटाना शुरू किया। तभी व्यापारी एकजुट हो गए और महापौर को सूचित किया। महापौर मौके पर पहुंचीं और गाड़ी से उतरे बिना ही कार्रवाई रोकने का आदेश दे दिया। निगम की टीम को अप्रत्याशित रूप से कार्रवाई रोककर वापस लौटना पड़ा।

महापौर का विवादास्पद बयान, बालको पर ठीकरा

महापौर ने मीडिया के सवालों पर कार्रवाई रोकने का ठीकरा बालको प्रबंधन पर फोड़ते हुए कहा कि कंपनी छत्तीसगढ़ के व्यापारियों के पेट पर लात मार रही है। हालांकि, बालको प्रबंधन ने इस कार्रवाई से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया और स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह नगर निगम की कार्रवाई थी। यह बयान नए विवाद को जन्म दे गया, क्योंकि बालको शेड निर्माण जैसे कार्यों के लिए निगम को आर्थिक सहायता देने को तैयार है। सवाल उठता है कि एसईसीएल, एनटीपीसी, और सीएसईबी जैसे अन्य क्षेत्रों में अतिक्रमण पर महापौर द्वारा सवाल क्यों नहीं उठाए जाते?

गलत संदेश और टूटा मनोबल

महापौर के इस हस्तक्षेप से न केवल निगम अधिकारियों का मनोबल टूटा है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि राजनीतिक संरक्षण के सामने नियम-कानून बेमानी हैं। इससे परसाभाठा चौक सहित अन्य सार्वजनिक स्थलों पर अतिक्रमण और अव्यवस्था बढ़ने की आशंका है।

जनता के सवाल: सुव्यवस्था कब?

यह पहला मौका नहीं है जब राजनीतिक हस्तक्षेप ने अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को रोका हो। जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं कि सत्ता और प्रशासन के बीच समन्वय की कमी क्यों है? बिना अतिक्रमण हटाए शहर को सुव्यवस्थित कैसे बनाया जाएगा? हालांकि, निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय के नेतृत्व में वेंडर जोन विकसित करने के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इस तरह के हस्तक्षेप इन प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं।

परसाभाठा चौक की अतिक्रमण समस्या और महापौर के हस्तक्षेप ने नगर निगम की नीतियों और नेतृत्व की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए हैं। जनता अब मांग कर रही है कि यातायात सुगम बनाने और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि यह चौक वास्तव में “आजाद” हो सके।