नई दिल्ली।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ आज (27 अगस्त 2025) से प्रभावी हो गए हैं। यह कदम मुख्य रूप से भारत के रूसी तेल खरीदने के कारण उठाया गया है, जो रूस को यूक्रेन युद्ध में आर्थिक मदद पहुंचाने का आरोप लगाता है। इस टैरिफ से भारत के करीब 48 अरब डॉलर के निर्यात प्रभावित होने का अनुमान है, जो देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जीडीपी में 40-50 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आ सकती है, साथ ही मुद्रास्फीति बढ़ने और लाखों नौकरियां जाने का खतरा है। हालांकि, कुछ सेक्टरों को छूट मिली है, जिससे वे अप्रभावित रह सकते हैं।
टैरिफ का पृष्ठभूमि और कारण
ट्रम्प प्रशासन ने पहले 25% टैरिफ लगाया था, जिसे अब अतिरिक्त 25% बढ़ाकर कुल 50% कर दिया गया है। यह फैसला भारत के रूसी तेल आयात को दंडित करने के उद्देश्य से लिया गया है, क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहा है। ट्रम्प ने चुनाव अभियान के दौरान ही भारत पर पारस्परिक टैरिफ लगाने की बात कही थी, और अब इसे अमल में लाया गया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, इस टैरिफ से भारत के लेबर इंटेंसिव सेक्टरों में निर्यात में 70% तक की गिरावट आ सकती है।
भारत को कितना आर्थिक नुकसान?
कुल प्रभावित निर्यात: 47-48.2 अरब डॉलर मूल्य के सामान पर असर पड़ेगा, जो भारत के कुल अमेरिकी निर्यात का बड़ा हिस्सा है।
जीडीपी प्रभाव: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की रिपोर्ट के मुताबिक, जीडीपी में 40-50 बेसिस पॉइंट्स (0.4-0.5%) की कमी आ सकती है। इससे आर्थिक विकास दर प्रभावित होगी और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
नौकरियां और एमएसएमई: लाखों नौकरियां खतरे में हैं, खासकर छोटे और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में। उत्पादन केंद्रों जैसे तिरुपुर, नोएडा और सूरत में पहले ही उत्पादन रुक गया है।
ट्रेड बैलेंस: सबसे खराब स्थिति में भारत का ट्रेड सरप्लस डेफिसिट में बदल सकता है। हालांकि, व्यापार वार्ताओं से स्थिति सुधारने की उम्मीद है।
कौन से सेक्टरों को नुकसान?
ट्रम्प के टैरिफ से कई सेक्टरों पर भारी असर पड़ेगा, क्योंकि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में 30-35% महंगे हो जाएंगे, जिससे वे वियतनाम, बांग्लादेश और चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों से पिछड़ जाएंगे। मुख्य प्रभावित सेक्टर:
टेक्सटाइल्स और अपैरल्स: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। यहां उत्पादन रुक गया है, और निर्यात में 70% गिरावट का अनुमान। तिरुपुर जैसे हब में एमएसएमई प्रभावित।
जेम्स और ज्वेलरी: सालाना 28.5 अरब डॉलर के निर्यात का एक-तिहाई अमेरिका को जाता है। सूरत में उद्योग संकट में।
सीफूड (मुख्य रूप से श्रिंप): आधे से ज्यादा निर्यात अमेरिका को। ऑर्डर रद्द होने और कीमतें गिरने का खतरा। इक्वाडोर जैसे देश फायदा उठा सकते हैं।
लेदर गुड्स और फुटवियर: लेबर इंटेंसिव सेक्टर, जहां बेरोजगारी बढ़ सकती है।
स्पोर्टिंग गुड्स, फर्नीचर और केमिकल्स: इन पर भी 50% टैरिफ, जिससे प्रतिस्पर्धा कम होगी।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (एफआईईओ) ने चेतावनी दी है कि इन सेक्टरों में उत्पादन रुकने से बेरोजगारी बढ़ेगी, और सस्ते क्रेडिट तथा लोन मोरेटोरियम की मांग की है।
कौन से सेक्टरों को फायदा?
कुछ सेक्टरों को टैरिफ से छूट मिली है, जिससे वे अप्रभावित रहेंगे या अप्रत्यक्ष फायदा उठा सकते हैं:
फार्मास्यूटिकल्स: अमेरिका भारत का बड़ा बाजार है, लेकिन एक्जेम्प्टेड होने से निर्यात जारी रहेगा। दवाओं की मांग बढ़ सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन्स: एप्पल आईफोन जैसे उत्पाद छूट प्राप्त। भारत की मैन्युफैक्चरिंग हब स्थिति मजबूत होगी।
कंप्यूटर चिप्स: सेमीकंडक्टर सेक्टर अप्रभावित, जो ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देगा।
अप्रत्यक्ष फायदा: घरेलू बाजार में आयातित सामान महंगा होने से स्थानीय उत्पादन बढ़ सकता है। साथ ही, भारत ऑस्ट्रेलिया, यूएई, यूके और ईयू के साथ एफटीए के जरिए वैकल्पिक बाजार ढूंढ रहा है।
ट्रेड एक्सपर्ट मार्क लिनस्कॉट ने इसे ‘लूज-लूज’ स्थिति बताया है, और अमेरिका-भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की सलाह दी है। पूर्व विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने कहा कि भारत वैकल्पिक बाजारों पर फोकस कर रहा है। एसबीआई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका को भी जीडीपी में गिरावट और मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ सकता है।
भारत सरकार डिप्लोमैटिक स्तर पर ट्रम्प प्रशासन से बात कर रही है, लेकिन फिलहाल कोई ट्रेड डील नहीं दिख रही। एक्सपोर्टर्स को इनोवेशन और सस्टेनेबिलिटी पर फोकस करने की सलाह दी जा रही है। यह टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में नई चुनौती पेश कर रहा है, लेकिन भारत की रेजिलिएंट अर्थव्यवस्था इसे झेलने की क्षमता रखती है।
Editor – Niraj Jaiswal
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