कोरबा। दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की दीपका विस्तार परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर मलगांव गांव में भूविस्थापितों और प्रबंधन के बीच तनाव चरम पर है। मुआवजा, रोजगार और बसाहट में मूलभूत सुविधाओं की कमी को लेकर वर्षों से चली आ रही लड़ाई में अब भूविस्थापितों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इस बीच, मलगांव के पूर्व पंच जवाहर सिंह चौहान, जिन्होंने फर्जी मुआवजा घोटाले को उजागर किया था, पर कोयला चोरी का आरोप लगाकर उन्हें कथित तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।
मलगांव: विलोपित गांव, लंबित मुआवजा
आधिकारिक रिकॉर्ड में मलगांव को पूरी तरह विस्थापित और विलोपित घोषित किया जा चुका है, लेकिन जमीन और परिसंपत्तियों के मुआवजे को लेकर ग्रामीणों और SECL प्रबंधन के बीच विवाद जारी है। मलगांव के भूविस्थापितों का आरोप है कि उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही रोजगार या पुनर्वास में मूलभूत सुविधाएं। दूसरी ओर, जिला प्रशासन और पुलिस पर SECL को जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए भूविस्थापितों पर दबाव बनाने का आरोप है। इस टकराव में सबसे ज्यादा प्रभावित वे ग्रामीण हैं, जिनके पास कोई “पहुंच” या “सेटिंग” नहीं है।
फर्जी मुआवजा घोटाले का पर्दाफाश
मलगांव के पूर्व पंच जवाहर सिंह चौहान ने पिछले वर्षों में गांव के प्रभावित ग्रामीणों के साथ मिलकर SDM कार्यालय के बाबू मनोज गोविल और कोयला ट्रांसपोर्टर श्यामू जायसवाल के परिजनों व रिश्तेदारों द्वारा करोड़ों रुपये के फर्जी मुआवजा हड़पने की साजिश को उजागर किया था। चौहान ने शासन-प्रशासन और पुलिस तक हस्ताक्षरित शिकायत पत्र पहुंचाए, जिसके बाद जांच में फर्जी मुआवजा वितरण को रोका गया। हालांकि, इस साहस का खामियाजा चौहान को भुगतना पड़ा। उन्हें बीच बाजार में मारपीट का शिकार बनाया गया, जिसके लिए FIR दर्ज हुई। चौहान का एक हाथ पहले से लकवाग्रस्त है, और मारपीट में पैर टूटने से उन्हें चलने में भी कठिनाई हो रही है।
कोयला चोरी का आरोप: साजिश या बदला?
हाल ही में गेवरा परियोजना प्रबंधन ने दीपका थाने में कोयला चोरी की शिकायत दर्ज की, जिसमें जवाहर सिंह चौहान सहित कई लोगों को आरोपी बनाया गया है। कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि चौहान फरार बताए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कोयला चोरी का यह मामला चौहान को निशाना बनाने की साजिश का हिस्सा है। चौहान ने पहले ही विभिन्न आवेदनों में आशंका जताई थी कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया जा सकता है। हाल ही में उनके घर पर आधी रात को राजस्व अधिकारी के साथ पुलिस की दबिश का CCTV फुटेज भी सामने आया है। चौहान ने बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को पत्र लिखकर झूठे मामले में फंसाए जाने की शिकायत करते हुए न्याय की गुहार लगाई है।
SECL की नीति: साम, दाम, दंड, भेद?
भूविस्थापितों के बीच चर्चा है कि SECL प्रबंधन अपनी अधिग्रहित जमीनों पर कब्जा करने के लिए अब साम, दाम, दंड और भेद की नीति पर उतर आया है। प्रबंधन ने भूविस्थापित नेताओं की एकता को तोड़ने का प्रयास किया है, जिसके चलते कई प्रमुख नेता अब बैकफुट पर हैं। कुछ को रोजगार और आर्थिक प्रलोभन देकर मध्यस्थ की भूमिका में लाया गया है, जो प्रबंधन और भूविस्थापितों के बीच “सेटिंग” का काम करते हैं। जो लोग अब भी अपने हक के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें झूठे मामलों में फंसाने या दबाव बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
संगठन शक्ति में सेंध
भूविस्थापितों की एकजुटता कमजोर पड़ रही है, क्योंकि प्रबंधन ने कुछ नेताओं को अलग-अलग तवज्जो देकर उनके बीच फूट डाल दी है। जो लोग संगठन के बैनर तले लड़ रहे थे, वे अब स्वतंत्र रूप से “रहनुमा” बनने की कोशिश में हैं। इस बीच, जवाहर सिंह जैसे लोग, जो बिना किसी “पहुंच” के अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, प्रबंधन के लिए “पब्लिक न्यूसेंस” बन गए हैं।
आगे क्या?
मलगांव के भूविस्थापितों की लड़ाई अब न केवल मुआवजे और रोजगार की है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था के खिलाफ है, जो कथित तौर पर सेटिंगबाजों को लाभ पहुंचाती है और आम ग्रामीणों को हाशिए पर धकेलती है। जवाहर सिंह चौहान का मामला इस बात का प्रतीक बन गया है कि अपने हक के लिए आवाज उठाने वालों को किस तरह निशाना बनाया जा सकता है। अब सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन और पुलिस इस मामले में निष्पक्ष जांच कर भूविस्थापितों को न्याय दिलाएंगे, या SECL की नीतियों के आगे उनकी आवाज दबती रहेगी?
Editor – Niraj Jaiswal
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