कोरबा जंगल में विश्व के सबसे विषैले सांपों में से एक, किंग कोबरा का साम्राज्य तेजी से फैल रहा है। वर्ष 2016 में पहली बार कुदमुरा वन परिक्षेत्र में देखा गया यह सांप अब कोरबा, कुदमुरा, पसरखेत, बालको और लेमरू के जंगलों में भी पाया गया है। रायपुर की नोवा नेचर वेलफेयर सोसायटी द्वारा पांच साल से किए जा रहे शोध में खुलासा हुआ है कि किंग कोबरा का कुनबा सरगुजा की सीमा तक पहुंच गया है, जिससे इसके अन्य जिलों में विस्तार की संभावना बढ़ गई है।
कोरबा का जंगल किंग कोबरा के साथ-साथ उड़न गिलहरी, कबरबिज्जू, उद्बिलाव, पैंगोलीन और रंग-बिरंगी तितलियों जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का पसंदीदा ठिकाना रहा है। यह जैवविविधता कोरबा के जंगलों की अनूठी विशेषता को दर्शाती है।
वन विभाग ने किंग कोबरा और अन्य सरीसृपों पर व्यापक अध्ययन शुरू किया है, जिसके तहत सरीसृप विशेषज्ञ 2021 से स्थानीय विवरण और संरक्षण संबंधी चुनौतियों पर डाटा जुटा रहे हैं। नोवा नेचर ने इसके डीएनए टेस्ट के लिए शासन से अनुमति मांगी है, ताकि पश्चिमी तराई क्षेत्र के किंग कोबरा से कोरबा के किंग कोबरा की आनुवंशिक भिन्नता का पता लगाया जा सके। हालांकि, अभी यह अनुमति मिलना बाकी है।
किंग कोबरा की खासियत है कि यह सरीसृप वर्ग में एकमात्र सांप है, जो चिड़ियों की तरह घोंसला बनाकर अंडे देता है। इसका प्रजनन काल जनवरी से अप्रैल तक होता है और यह मुख्य रूप से अन्य सांपों को अपना आहार बनाता है।
कोरबा को जशपुर के बाद छत्तीसगढ़ का दूसरा ‘नागलोक’ कहा जाता है, जहां स्थानीय लोग इसे ‘पहरचित्ती सांप’ के नाम से जानते हैं। वन विभाग और शोधकर्ता इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं, ताकि कोरबा की समृद्ध जैवविविधता को संरक्षित किया जा सके।
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