एनटीपीसी कोरबा नहीं खपा सका 20.77 लाख टन राख

कोरबा । औद्योगिक नगरी कोरबा में ज्यादातर लो- लाइन एरिया (अनुपयोगी निचली जमीन) में राखड़ (फ्लाइ ऐश) भरा जा चुका है। इस वजह से पर्यावरण संरक्षण मंडल कार्यालय से लो-लाइन एरिया में राखड़ डंप किए जाने की अनुमति प्रदान नहीं की जा रही है। इसका सर्वाधिक असर नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन लिमिटेड (एनटीपीसी) के कोरबा संयंत्र पर पड़ा है। यहां वर्ष 2023-24 में 52.68 लाख टन राख का उत्सर्जन हुआ था। उपयोगिता 31.91 लाख टन यानी 60.57 प्रतिशत ही हो सकी। 20.66 लाख टन राखड़ धनरास डैम में भंडारण करना पड़ा।

2600 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता वाले एनटीपीसी कोरबा संयंत्र में 500 मेगावाट के चार और 200 मेगावाट के तीन इकाई संचालन में है। हर वर्ष औसतन 130 लाख टन कोयले की खपत होती है। इसमें 45 प्रतिशत राख उत्सर्जन होता है। देश भर के विद्युत संयंत्रों के ज्यादातर राखड़ डैम न केवल भर चुके हैं, बल्कि रेजिंग (ऊंचाई बढाना) की जा चुकी है।

राख से फैलने वाले प्रदूषण पर रोकथाम के लिए करीब चार साल पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने शत प्रतिशत राख खपत के निर्देश दिए। साथ ही डैम में डंप राख को भी खाली करने कहा गया। वर्तमान में जिले को बिजली संयंत्रों के डैम से राख खाली कराने का काम चल रहा। इसके लिए ट्रांसपोर्ट कंपनियों को ठेका दिया गया है।

निर्धारित स्थान पर राख डंप करने की जगह रिहायशी इलाकों में डंप कर दिए जाने से प्रदूषण फैलने के कई मामले सामने आ चुके हैं। प्रदूषण की रोकथाम के इन तमाम कवायदों के बीच एनटीपीसी कोरबा संयंत्र का राखड़ खपत का सालाना आंकड़ा निराशाजनक रहा।

फ्लाईऐश ब्रिक्स, सीमेंट फैक्ट्री व बंद कोयला खदान में तो राखड़ की आपूर्ति की जा रही, पर लो- लाइन एरिया की संभावनाएं अब इस क्षेत्र में समाप्त हो चुकी। यही वजह है कि पिछले कई माह से पर्यावरण संरक्षण मंडल के क्षेत्रीय कार्यालय से लो- लाइन एरिया में राख डंप करने की अनुमति प्रदान नहीं की जा रही। राख खपत नहीं कर पाने की असफलता का खामियाजा क्षेत्र के लोगों को ही उठाना पड़ेगा।

12 प्रतिशत आबादी दमा और ब्रोंकाइटिस से ग्रस्त

हालिया हुए सर्वे में सामने आया है कि प्रदूषणजनित कारकों से क्षेत्र की करीब 12 प्रतिशत आबादी दमा और ब्रोंकाइटिस से ग्रस्त है। एनटीपीसी कोरबा से उत्सर्जित होने वाली राख का शत प्रतिशत उपयोग नहीं हो पाना चिंताजनक है। उपयोग नहीं होने वाले राख को पाइप लाइन से धनरास राखड़ डैम में डंप कर दिया जाता है। इस राख को अंतत: सड़क मार्ग परिवहन के माध्यम से प्रबंधन को खपाना पड़ेगा। यह प्रदूषण मुक्त शहर की राह में बहुत बड़ी बाधा है।