चैतमा व सर्वमंगला चौकी को अब तक नहीं मिला अपना भवन, स्टाफ के लिए आवासीय व्यवस्था भी नहीं
कोरबा। कोरबा जिले में पुलिस व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से संचालित चैतमा और सर्वमंगला पुलिस चौकी लंबे समय से अस्थायी व्यवस्था के भरोसे चल रही हैं। करीब एक दशक से दोनों चौकियों का संचालन सामुदायिक भवनों में हो रहा है। पुलिसकर्मियों के लिए भी पर्याप्त आवासीय सुविधा नहीं होने से उन्हें कई तरह की व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं सामुदायिक भवनों के पुलिस चौकी के रूप में इस्तेमाल होने से स्थानीय लोगों को भी इन भवनों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
2016 से सामुदायिक भवन में चैतमा चौकी
चैतमा पुलिस चौकी का संचालन वर्ष 2016 से पंचायत के सामुदायिक भवन में किया जा रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों में पुलिस चौकी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर भवन उपलब्ध कराया गया था। उस समय उम्मीद थी कि जल्द ही पुलिस चौकी के लिए अलग भवन का प्रस्ताव स्वीकृत होकर निर्माण शुरू हो जाएगा, लेकिन करीब दस वर्ष बीतने के बाद भी स्थायी भवन की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
चौकी परिसर में ही पुलिसकर्मियों के रहने की व्यवस्था होने के कारण जगह की कमी सहित कई तरह की परेशानियां बनी रहती हैं।
फोरलेन निर्माण के बाद सर्वमंगला चौकी भी अस्थायी भवन में
इसी तरह कुसमुंडा थाना अंतर्गत संचालित सर्वमंगला पुलिस चौकी भी लंबे समय से सामुदायिक भवन से संचालित हो रही है। पहले चौकी मुख्य मार्ग के किनारे स्थित भवन में संचालित होती थी, लेकिन फोरलेन सड़क निर्माण के दौरान पुराने भवन को डिस्मेंटल कर दिया गया।
इसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर सामुदायिक उपयोग के लिए बनाए गए भवन में चौकी का संचालन शुरू किया गया। करीब एक दशक बाद भी चौकी को अपना स्थायी भवन नहीं मिल सका है। पुलिस कर्मचारियों के लिए यही परिसर अस्थायी आवास का रूप भी ले चुका है।
सामुदायिक भवनों का उपयोग भी प्रभावित
दोनों चौकियों के सामुदायिक भवनों में संचालित होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों को सामाजिक एवं सामुदायिक आयोजनों के लिए इन भवनों का उपयोग करने में परेशानी होती है। दूसरी ओर पुलिसकर्मियों के लिए भी पर्याप्त जगह और अलग आवासीय सुविधा का अभाव बना हुआ है।
जानकारी के अनुसार दोनों पुलिस चौकियों के लिए स्थायी भवन और पुलिसकर्मियों के आवास निर्माण की व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर से प्रस्ताव उच्च स्तर पर भेजे जा चुके हैं।
अब देखना होगा कि इन प्रस्तावों को कब मंजूरी मिलती है और करीब एक दशक से चली आ रही अस्थायी व्यवस्था से पुलिसकर्मियों तथा स्थानीय लोगों को कब राहत मिलती है।
Editor – Niraj Jaiswal
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