कोरबा रेलवे स्टेशन के सोलर पैनल पर कोल डस्ट की मोटी परत, स्वच्छ ऊर्जा के दावों पर उठे सवाल


करोड़ों की सोलर परियोजना पर कोयले की धूल, महीनों से सफाई तक नहीं, कई पैनल टूटे-झुके; आत्मनिर्भर ऊर्जा का सपना धूल में मिला

कोरबा। देश के सबसे बड़े कोयला उत्पादक क्षेत्र कोरबा में स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें लगातार बड़े-बड़े दावे कर रही हैं। लेकिन यही कोरबा रेलवे स्टेशन की छत पर लगे सोलर पैनल इन दावों की पोल खोल रहे हैं।

रेलवे स्टेशन को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से वर्षों पहले छत पर लगाए गए सैकड़ों सोलर पैनल आज पूरी तरह उपेक्षित और कोल डस्ट की मोटी परत में दबे नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों और यात्रियों का कहना है कि महीनों से इन पैनलों की सफाई तक नहीं हुई है।

परिणामस्वरूप ज्यादातर पैनल पर कोयले की काली धूल की इतनी मोटी परत जमी है कि सूर्य की किरणें भी उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई पैनल झुक गए हैं, कुछ टूट चुके हैं और वायरिंग भी खुले में लटक रही है। रखरखाव के नाम पर कोई इंतज़ाम नज़र नहीं आता।

यात्रियों का सवाल है कि जब ये पैनल ही बिजली नहीं पैदा कर पा रहे, तो स्टेशन की लाइटिंग, पंखे और अन्य सुविधाओं के लिए बिजली कहाँ से आ रही है? क्या यह करोड़ों रुपये की सोलर परियोजना सिर्फ़ कागज़ी घोड़ा साबित होकर रह गई?

ज्ञात हो कि कोरबा को “पावर हब ऑफ़ छत्तीसगढ़” कहा जाता है और यहाँ NTPC, CSPGCL सहित कई बड़े ताप विद्युत संयंत्र हैं। कोयले से चलने वाले इन संयंत्रों के कारण पूरे क्षेत्र में कोल डस्ट का भारी प्रदूषण रहता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कोयले वाले क्षेत्र में सोलर पैनलों का प्रभावी संचालन तभी संभव है जब उनकी नियमित सफाई और रखरखाव का मजबूत सिस्टम हो, जो यहाँ पूरी तरह गायब है।

यात्रियों और पर्यावरण प्रेमियों ने रेलवे प्रशासन से मांग की है कि तत्काल इन पैनलों की सफाई और मरम्मत का काम शुरू किया जाए, वरना स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर जनता के पैसे की बर्बादी होती रहेगी। अब देखना यह है कि रेलवे और जिला प्रशासन इस मामले में कब जागता है।