कोरबा। कोल सेक्टर में भू-अर्जन के मामलों में छोटे खातेदारों को रोजगार देने के निर्देश कोर्ट ने दिए है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में एसईसीएल कंपनी की मनमानी जारी है। वह छोटे खातेदारों को रोजगार देने से वंचित कर रहा है। ऐसे में यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या एसईसीएल के नियम कायदे कोर्ट से ऊपर है?
एसईसीएल कोरबा क्षेत्र के द्वारा सरायपाली, बुड़बुड़ खुली खदान के लिए कोल उत्खनन हेतु ग्राम बुड़बुड़ एवं राहाडीह की 550 एकड़ भूमि वर्ष 2007 में प्रथम चरण के लिए अर्जित की थी। सहमति के अनुरूप मध्यप्रदेश पुनर्वास नीति 1991 में रोजगार न देकर बगैर सहमति कोल इंडिया पॉलिसी 2012 लागू कर छोटे खातेदारों को रोजगार से अपात्र कर दिया गया।
छोटे खातेदारों ने रोजगार नहीं मिलने के कारण उच्च न्यायालय बिलासपुर में पिटीशन दायर किया। जिसके संबंध में उच्च न्यायालय बिलासपुर ने 15 जनवरी 2025 को आदेश पारित किया है कि अर्जन के समय प्रचलित नीति के तहत रोजगार प्रदान किया जाय।
जिसके खिलाफ एसईसीएल ने डबल बेंच में अपील की थी जहां अपील खारिज कर दी गई। उच्च न्यायालय बिलासपुर के द्वारा पारित आदेश के अनुसार अर्जन के समय प्रचलित नीति के अनुसार रोजगार दिया जाना था।
खबर के अनुसार ग्राम बुड़बुड़ एवं राहाडीह के अर्जित भूमि का अवार्ड वर्ष 2007 में पारित हुआ था। उक्त समय छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति 2007 प्रचलित थी। छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति 2007 के अनुसार जितने रोजगार सृजित होंगे , उतने रोजगार उद्योग द्वारा दिया जाएगा है।
इसके संबंध में महाप्रबंधक कोरबा ने याचिका लगाने वाले खातेदारों को पत्र प्रेषित कर अवगत कराया है कि छत्तीसगढ़ राज्य की आदर्श पुनर्वास एवं पुर्नस्थापना नीति 2007 की कंडिका क्रमांक 7.1 (ज) के अनुसार सरायपाली एवं राहाडीह खुली खदान की अनुमोदित प्रोजेक्ट रिपोर्ट में नियमित रोजगार के अवसर कुल 161 पद उपलब्ध होते हैं। जबकि कोल इंडिया लिमिटेड की पुनर्वास एवं पुर्नस्थापना नीति के अनुसार कुल 321 नियमित रोजगार के पद सृजित होते हैं, जो कि तुलनात्मक दृष्टिकोण से भुविस्थापितों के लिए अधिक लाभकारी है। लेकिन एसईसीएल अपने नियम थोपने की कोशिश कर रहा है।
Editor – Niraj Jaiswal
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