हिन्दी दिवस: भारतीय संस्कृति की आत्मा का उत्सव, वैश्विक मंच पर बढ़ता कदम: डॉ. अलका यादव

हिन्दी दिवस के अवसर पर डॉ. अलका यादव ने हिन्दी की उत्पत्ति, संवैधानिक स्थिति और वैश्विक प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विचार और भावनाओं की आत्मा है। इसका उद्भव 1000 ईस्वी के आसपास हुआ और साहित्यिक रचनाओं का विकास 1150 ईस्वी से शुरू हुआ।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1917 में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में जनता को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया और 1950 में संविधान के अनुच्छेद 343(1) के तहत देवनागरी लिपि में हिन्दी को आधिकारिक राजभाषा घोषित किया गया। तब से 1953 से प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

हिन्दी का प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर फैल रहा है। भारत में 850 से अधिक महाविद्यालयों में हजारों छात्र हिन्दी का अध्ययन कर रहे हैं। चीन में प्रो. ची श्येन द्वारा स्थापित भारत विद्या विभाग में हिन्दी और संस्कृत की पढ़ाई होती है।

रामचरितमानस, गोदान, राग दरबारी, जयशंकर प्रसाद और कृष्ण चंदर की रचनाएं चीनी भाषा में अनूदित हो चुकी हैं। कनाडा में भी हिन्दी शैक्षणिक और साहित्यिक स्तर पर लोकप्रियता हासिल कर रही है, जहां कक्षाएं, संगोष्ठियां और मंच इसके प्रसार में योगदान दे रहे हैं।

डॉ. यादव ने बल देकर कहा कि हिन्दी भारत की संस्कृति और दर्शन का प्रतीक है, जो अतीत को भविष्य से जोड़ती है।

उन्होंने अपील की कि हिन्दी को केवल औपचारिक अवसरों तक सीमित न रखकर, इसे गर्व के साथ जीवन के हर क्षेत्र में अपनाया जाए। हिन्दी दिवस हमें इसके सम्मान और प्रसार के लिए संकल्प लेने का अवसर प्रदान करता है।