कोरबा।छत्तीसगढ़ी कहावत “कब बबा मरही, त कब बरा चुरही अऊ खाबो…” कोरबा जिले की सड़कों की बदहाली पर सटीक बैठती है। जिले की जनता, न सिर्फ कोरबा शहर बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी, सड़कों के गड्ढों और खराब हालात से त्रस्त है। ये गड्ढे सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं, जिससे हर दिन सफर एक जोखिम भरा अनुभव बन गया है।
गड्ढों का आतंक: हादसों का डर
कोरबा की सड़कों पर गड्ढों की भरमार है। कुछ जगहों पर हालात इतने बदतर हैं कि लगता है, वाहन सीधे रसातल में समा जाएंगे। लोग डरते-डरते सड़कों के किनारे से निकलने को मजबूर हैं। हर बार जिम्मेदारों को कोसते हुए जनता सवाल उठाती है कि आखिर कब टेंडर होंगे, कब राहत मिलेगी?


जैसा दाम, वैसा काम
बरसात में निर्माण कार्य रुक जाते हैं, लेकिन बाकी मौसमों में टेंडर तो जारी होते हैं, पर सड़कों की गुणवत्ता ठेकेदारों के चढ़ावे और अधिकारियों की मेहरबानी पर निर्भर करती है। “जैसा दाम, वैसा काम” की तर्ज पर सड़कें बनती हैं, जो जल्दी ही उखड़ जाती हैं। जनता को सुविधा के नाम पर सिर्फ निराशा मिलती है।
सत्ता बदली, हालात वही
पिछली सरकार हो या वर्तमान, सड़कों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। गड्ढों में सड़क ढूंढना पड़ रहा है, जिससे वाहनों के साथ-साथ लोगों का शरीर भी टूट रहा है। मानसिक तनाव और शारीरिक तकलीफ के बीच लोग सही-सलामत घर लौटने की कामना करते हैं।
डीएमएफ का पैसा, फिर भी लाचारी
डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) के तहत मिलने वाला पैसा संजीवनी की तरह है, लेकिन जनप्रतिनिधियों की इच्छाशक्ति की कमी और भ्रष्टाचार ने सिस्टम को जर्जर कर दिया। ठेकेदारों के खराब काम पर न तो भुगतान रोका जाता है, न कार्रवाई होती है। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ही इस भ्रष्टाचार में शामिल दिखते हैं।
टैक्स भरो, सुविधा भूल जाओ
जनता टैक्स तो भरपूर देती है, लेकिन बदले में सुगम सड़कों का सपना अधूरा रहता है। शहर की आंतरिक सड़कें हों या बाहरी, हालात बद से बदतर हैं। रेलवे क्रॉसिंग की स्थिति तो और भी खराब है, जहां दोपहिया वाहनों का पहिया फंसना आम बात है। ब्रेकर और गड्ढों का कॉकटेल हर सफर को मुश्किल बना देता है।
बारहमासी समस्या
यह समस्या सिर्फ बरसात की नहीं, बल्कि साल भर की है। ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं, और रखरखाव की अवधि में भी सड़कें टूटने लगती हैं। कार्रवाई के नाम पर खानापूरी होती है, क्योंकि “सब अपने हैं।”
जनता की पुकार
कोरबा की जनता अब सिर्फ एक सवाल पूछ रही है- आखिर कब मिलेगी अच्छी सड़क? गड्ढों से भरे रास्तों पर चलते हुए न सिर्फ वाहन, बल्कि जनता का धैर्य भी जवाब दे रहा है। सरकार और प्रशासन से अपेक्षा है कि वे इस बदहाली को दूर करें, वरना यह कहावत यूं ही चरितार्थ होती रहेगी- “कब बबा मरही, त कब बरा चुरही अऊ खाबो…”
Editor – Niraj Jaiswal
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