कोरबा। आर्जव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल-कपट और मायाचार के अभाव रूप, शांतिस्वरूप जो पर्याय प्रकट होती है, उसे ही उत्तम आर्जव धर्म कहा जाता है। कुटिलता अधर्म है, इससे दूर रहकर जीवन को सरल और सहज बनाना ही उत्तम आर्जव है।
बुधवारी बाजार स्थित दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन आर्यिका रत्न श्री 105 अखंड मति माताजी एवं आर्यिका रत्न श्री 105 अभेदमति माताजी ने प्रवचन दिए।
माताजी ने कहा कि जब मन सरल और पवित्र होता है तो वाणी भी पवित्र हो जाती है और यही वाणी तन को सुंदर बनाती है। यही उत्तम आर्जव धर्म है। इसका पालन तभी संभव है जब व्यक्ति में अधिक से अधिक सरलता हो। मन, वचन और शरीर की कुटिलता को दूर कर मृदुता एवं सरलता का पालन करना ही इसका मूल है।
प्रात: 7 बजे से अभिषेक, शांति धारा और पूजन के साथ कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। तत्पश्चात तत्वार्थ सूत्र का वाचन एवं उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन हुआ।
शाम को जैन मिलन समिति द्वारा मोनो एक्टिंग, धार्मिक एवं फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें समाज के लोगों ने उत्साह से भाग लिया।
Editor – Niraj Jaiswal
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