बांगो बांध की पांच प्रतिशत घट गई जल संग्रहण क्षमता, 151.3 मिलियन क्यूबिक पानी संग्रहण में आई कमी

कोरबा। जीवन दायनी हसदेव नदी पर बनी बांगो बांध के पानी भराव क्षेत्र में साल दर साल मड (कीचड़) की परत बढ़ रही है। इससे उसकी जल संग्रहण क्षमता घटने लगी है। जल संसाधन विभाग ने साल भर पहले दिल्ली की (आरसीटी) रिमोर्स सेंसर टेक्निक टीम से सर्वेक्षण कराया था। टीम ने रिपोर्ट जारी कर दी है। 40 साल के भीतर 151.3 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण में कमी आ गई है। अब मिट्टी निकालने के लिए जल संसाधन को शासन से राशि आवंटन का इंतजार है। वर्षा के दौरान ऊपरी क्षेत्र से आने वाली पानी के साथ हर साल मिट्टी भी बहकर आती है। समय रहते कीचड़ नहीं निकाली गई तो बांध की भराव क्षमता घटती चली जाएगी।
बांगों बाधकी कुल जल भराव क्षमता 3046 मिलियन क्यूबिक मीटर है। मिट्टी भराव के कारण इसकी क्षमता 2894.70 मिलियन क्यूबिक मीटर हो गई है। बांगो बांध में जल भराव कोरिया जिले में होने वाली वर्षा जल पर निर्भर है। मानसून वर्षा मैदानी क्षेत्रों से मिट्टी भी लेकर आती है। वर्ष-दर- वर्ष मिट्टी की परत बांध की जल सतह पर बढ़ती जा रही है। इसकी जांच जल संसाधन विभाग ने रिमोर्ट सेंसर टेक्निक से जांच कराया है।

यह वह तकनीक है जो इस बात की जानकारी देते है कि वर्ष वार मिट्टी की परत कितनी जमी है। जल संसाधन विभाग ने दो साल पहले निदान के लिए मिट्टी निकालने के लिए प्राक्कलन तैयार राशि 10 करोड़ राशि की मांग की थी। तकनीकी संस्थान से जांच के बाद भी राशि आवंटन की जाती है। यही वजह है कि अब तक मड निकालने के राशि जारी नहीं हुई है। बांध की सुरक्षा की दृष्टि से मड का बाहर निकाला जाना अति आवश्यक है।
बांगो बांध के पानी से 24 छोटे-बड़े औद्योगिक संयंत्र के अलावा रायगढ़, जांजगीर तीन लाख 62 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि में को जलापूर्ति होती है। पानी का उपयोग सिंचाई और उद्योग के अलावा निस्तारी के लिए भी होता। अकेले शहरी क्षेत्र दो बड़े जल आवर्धन योजनाओं से शहर के नौ लाख आबादी को जल आपूर्ति होती है। शहर के अलावा अब उपनगरीय क्षेत्रों व अन्य जिलों में पेयजल निदान के लिए पानी की मांग बढ़ने लगी है। ऐसे में जल भराव क्षमता में कमी योजनाओं के विफलता का कारण बन सकता है। मानसून में इस बार पूर्ण भराव नहीं हुई तो इसका सीधा असर सिंचाई और औद्योगिक संयंत्रों की आपूर्ति पर होगा।

दर्री बांध में भी पड़ रहा असर

बांगो बांध की तरह मिट्टी भराव का असर दर्री बांध में पड़ रहा है। बराज के भराव का भी जल संसाधन ने तकनीकी आकलन कराया है। बांध के भूमिगत सतह से 941 इंच तक पानी का भराव किया जाता है। इससे अधिक होने पर गेट खोल दी जाती है। बराज का कुल जल संग्रहण क्षेत्र 7723 वर्ग किलो मीटर है। माना जा रहा है कि पूरे भराव क्षेत्र में मिट्टी भरने का असर होने से जल भराव आठ प्रतिशत कम हो गया है। दर्री बांध के दायें और बाए तट नहर से जलापूर्ति होती हैं। मिट्टी भराव का असर नहर में भी देखी जा रही।

चार साल से नहीं हुआ पूर्ण भराव

बांगो बांध में पानी का भराव उपरी क्षेत्र कोरिया जिले में होने वाली वर्षा पर निर्भर है। बीते चार साल से बांध में पूरा भराव नहीं हुआ है। सिंचाई और औद्योगिक संस्थान में पानी की कमी की आशंका को देखते हुए हाइडल प्लांट चलाने के समय को कम कर दिया गया है। वर्तमान में प्लांट को तीन घंटे ही संचालित किया जा रहा हैं। बांध में अभी कुल भराव का 44 प्रतिशत पानी शेष है। बीते वर्ष की तुलना में यह छह प्रतिशत कम है। पानी मांग बढ़ने और मानसून के बाद कम वर्षा होने की वजह जल स्तर घट रहा है। बांध को पूरा भरने में मानसून के दौरान 56 प्रतिशत पानी भराव की आवश्यकता होगी।

धान के मूल्य वृद्धि से बढ़ा 46 हजार बोआई रकबा

जल खपत होने के पीछे धान फसल के रकबा में वृद्धि होना भी शामिल है। समर्थन मूल्य में धान की खरीदी मिलने से किसानों की खेती के प्रति रूचि बढ़ी है। तीन साल के भीतर अकेल धान के रकबा में कोरबा, जांजगीर और रायगढ़ में 46,000 हेक्टेयर की वृद्धि हुई है। दीगर फसल की तुलना में धान उपज में सर्वाधिक पानी की खपत होती है। मानसून का दौर होने के बावजूद रबी की तुलना में खरीफ के दौरान बांध से पानी छोड़ा जाता है। धान का रकबा बढ़ने के साथ लघु व कुटीर उद्योगों के लिए भी से बांध से पानी की मांग भी बढ़ गई है। कम वर्षा की तुलना में पानी की आवश्यकता अधिक होने से बांध के भराव में असर होेना स्वाभाविक है।

48 करोड़ सालाना राजस्व देने के बाद भी नहर जर्जर

बांगो बांध से जल प्रदान करने एवज में प्रति वर्ष शासन को 48 करोड़ राजस्व की आय होती है। इस खूबी के बाद भी नहर के जीर्णोद्धार की दिशा में कारगर कदम नहीं उठाया जा रहा। उद्योग और सिंचाई के लिए पानी देने का मुख्य आधार शहर के निकट निर्मित दर्री बांध है। यहां से निकली दायी नहर 18 व बायी तट नहर 38 किलोमीटर तक विस्तावित है। दोनों नहरों की दशा जर्जर हो चुकी है। समय पर मरम्मत नहीं कराने का खामियाजा किसानों का भुगतना पड़ता है। अगस्त माह उमरेली के निकट बहने वाली नहर के टूट जाने 80 किसानों 386 एकड़ फसल को नुकसान हुआ।