कोयला खदानों के धुएं-धूल में घुट रही बड़ी आबादी

150 मिलियन टन से अधिक उत्पादन, फिर भी प्रदूषण नियंत्रण के दावे बेअसर; परिवहन के दौरान उड़ती धूल से लोग परेशान

कोरबा। कोरबा,कुसमुंडा, गेवरा और दीपका की कोयला खदानों से बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। प्रतिवर्ष 150 मिलियन टन से अधिक कोयला उत्पादन वाले इस क्षेत्र में खदानों के आसपास बसे रिहायशी इलाकों के लोग लंबे समय से वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण के दावों के बावजूद जमीनी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है।

खदानों से निकलने वाले कोयले का परिवहन रेल और सड़क मार्ग से किया जाता है। एसईसीएल के अलावा आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से भी परिवहन होता है। परिवहन के दौरान धूल रोकने के लिए नियम और दिशा-निर्देश तय हैं, लेकिन कई स्थानों पर खुले परिवहन और कोयले की धूल उड़ने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। हवा के साथ कोयले के महीन कण आसपास के रिहायशी और औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं।

बीमारी के साथ बढ़ रहा मानसिक तनाव
स्थानीय लोगों और कोयला कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ रही हैं। उपचार पर आय का बड़ा हिस्सा खर्च होने के साथ लगातार प्रदूषण के बीच रहने से मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रावधान अपनी जगह हैं, लेकिन बीमारी की वजह बनने वाले प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण ज्यादा जरूरी है।

प्रशासन और यूनियनों से हस्तक्षेप की मांग
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि कोयला परिवहन के दौरान प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। खुले परिवहन पर रोक, धूल नियंत्रण के प्रभावी इंतजाम और नियमों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए। लोगों ने प्रशासन के साथ ट्रेड यूनियनों से भी इस मुद्दे पर हस्तक्षेप कर ठोस पहल की मांग की है।