धमतरी जिले में स्थित बिलाई माता मंदिर न केवल एक प्रमुख शक्तिपीठ है, बल्कि अपनी रहस्यमय कथा और अनूठी परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। प्रदेश के पांच प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार यह मंदिर बिल्लियों से जुड़ी अपनी स्थापना कथा के कारण विशेष पहचान रखता है।
स्थापना की रहस्यमय कथा: लोककथाओं के अनुसार, मंदिर का स्थान पहले घना जंगल था। एक बार राजा ने वहां एक पत्थर के पास जंगली बिल्लियों को लगातार बैठे देखा। पत्थर हटाने का प्रयास असफल रहा और उस स्थान से जल प्रवाह शुरू हो गया। रात में देवी मां ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर पत्थर की पूजा का आदेश दिया। इसके बाद राजा ने मंदिर की स्थापना करवाई, जिससे बिलाई माता की पूजा का सिलसिला शुरू हुआ।
स्वयंभू मूर्ति का चमत्कार: मंदिर की स्वयंभू मूर्ति को मां विंध्यवासिनी का रूप माना जाता है, जो लगभग 500-600 वर्ष पुरानी है। लोकविश्वास है कि यह मूर्ति धीरे-धीरे जमीन से ऊपर आई। इसका काला रंग और आसपास बिल्लियों की मौजूदगी इसे “बिलाई माता” की संज्ञा देती है।
परंपराओं में बदलाव: प्राचीन काल में नवरात्रि के दौरान यहां 108 बकरों की बलि दी जाती थी, लेकिन अब यह प्रथा समाप्त हो चुकी है। आज श्रद्धालु प्रसाद और पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। नवरात्रि में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी की आराधना करते हैं।
आस्था का प्रमुख केंद्र: बिलाई माता मंदिर आज छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर साल ज्योत प्रज्जवलन की रस्म बड़े उत्साह से आयोजित होती है। दूर-दूर से भक्त यहां दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं, जो इस मंदिर को अपनी आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव मानते हैं।
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