स्वतंत्रता दिवस की खुशी के बीच प्रदूषण से आजादी की मांग, हसदेव नदी और स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देने की जरूरत

कोरबा।छत्तीसगढ़ की ऊर्जाधानी कोरबा में 79वां स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया गया, जहां तिरंगे की शान और देशभक्ति का जोश हर ओर नजर आया। लेकिन इस उत्सव के बीच कोरबा के लोग एक गंभीर सवाल उठा रहे हैं: वर्षों से चले आ रहे प्रदूषण के संकट से उन्हें कब आजादी मिलेगी? कोयला खदानों, ताप विद्युत संयंत्रों और वाहन उत्सर्जन से उत्पन्न कोल डस्ट, राख और धुएं ने शहर की हवा को जहरीला बना दिया है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही हसदेव नदी की सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और नए ट्रांसपोर्ट नगर की स्थापना जैसे मुद्दों पर भी तत्काल ध्यान देने की मांग उठ रही है।

प्रदूषण: कोरबा की सबसे बड़ी चुनौती

कोरबा, जिसे काले हीरे की नगरी और देश का पावर हब कहा जाता है, अपनी ऊर्जा उत्पादन क्षमता के लिए जाना जाता है। यहां के ताप विद्युत संयंत्र और कोयला खदानें देश की बिजली जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन इस विकास की कीमत शहरवासियों को अपनी सेहत और पर्यावरण के साथ चुकानी पड़ रही है। बिजली संयंत्रों में प्रतिद दिन 70,000 टन से अधिक कोयले की खपत होती है, जिसमें से 35% राख के रूप में उत्सर्जित होती है, जो हवा और पर्यावरण को प्रदूषित करती है।

गेवरा, दीपका, कुसमुंडा और राताखार जैसे खदान क्षेत्रों में कोल डस्ट की समस्या गंभीर है। खदानों से कोयले के परिवहन के दौरान सड़कों पर उड़ने वाला कोल डस्ट फेफड़ों में प्रवेश कर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा, शहर में बढ़ते वाहनों, खासकर भारी वाहनों से निकलने वाला धुआं भी प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, कोरबा का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) खासकर अप्रैल-मई में 170 से अधिक हो जाता है, जो खतरनाक स्तर को दर्शाता है।

स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा

प्रदूषण के कारण कोरबा में स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं। स्टेट हेल्थ रिसोर्स सेंटर की मार्च 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों में अस्थमा के लक्षण 11.79% और ब्रोंकाइटिस के 2.96% मरीज पाए गए, जबकि कटघोरा जैसे अपेक्षाकृत स्वच्छ क्षेत्रों में यह दर क्रमशः 5.46% और 0.99% थी। समय के साथ स्थिति में सुधार के बजाय यह और गंभीर हो रही है। स्थानीय लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, क्योंकि सरकारी और निजी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और उचित उपचार की कमी है। कई निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से लूट की शिकायतें आम हैं, जबकि सरकारी अस्पतालों में सामान्य बीमारियों के लिए भी मरीजों को रेफर कर दिया जाता है।

हसदेव नदी की सुरक्षा जरूरी

जीवनदायिनी हसदेव नदी, जो कोरबा की पहचान है, प्रदूषण की चपेट में है। औद्योगिक इकाइयों और खदानों से निकलने वाला दूषित जल सीधे नदी में प्रवाहित हो रहा है, जिससे इसका पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है। नमामि हसदेव सेवा समिति और स्थानीय लोग नदी के संरक्षण के लिए जनजागरण अभियान चला रहे हैं। समिति ने नदी के सौंदर्यीकरण के लिए रिवर फ्रंट विकसित करने की मांग की है। कोरबा नगर निगम ने भी हसदेव को सीवरेज के पानी से बचाने के लिए कदम उठाए हैं और 5-स्टार रेटिंग का लक्ष्य रखा है।

ट्रांसपोर्ट नगर और यातायात व्यवस्था

शहर के बीच से गुजरने वाला बायपास रोड यातायात की समस्या को बढ़ा रहा है। स्थानीय लोगों और अधिवक्ता श्वेता कुशवाहा ने नए ट्रांसपोर्ट नगर की स्थापना की मांग की है, जो उरगा, गोपालपुर, कुसमुंडा या कोरबा के बाहरी हिस्सों में बनाया जा सकता है। इससे भारी वाहनों का दबाव कम होगा और प्रदूषण में कमी आएगी। इसके अलावा, यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करने और वाहन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है।

प्रदूषण नियंत्रण और न्याय व्यवस्था

अधिवक्ता श्वेता कुशवाहा ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि त्वरित और पारदर्शी न्याय प्रणाली आज भी एक चुनौती है, जिसे दूर करने के लिए ठोस प्रयास जरूरी हैं। साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण के लिए नियमों का सख्ती से पालन और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली राख का शत-प्रतिशत व्यवस्थापन आवश्यक है।

कोरबा की ऊर्जाधानी की पहचान देश के लिए गर्व का विषय है, लेकिन प्रदूषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं, और हसदेव नदी की बदहाल स्थिति इसके विकास में बाधा बन रही हैं। स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर कोरबा के लोग स्वच्छ हवा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और हसदेव नदी की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। शासन-प्रशासन को प्रदूषण नियंत्रण, यातायात व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि कोरबा न केवल ऊर्जा का केंद्र बने, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ जीवन का प्रतीक भी बन सके।