शरद पूर्णिमा आज, चांदनी में रखी खीर ग्रहण करने की परंपरा

तुलसी सेवा और दीपदान का विशेष महत्व : दीपू महाराज

कोरबा।शरद पूर्णिमा का पर्व रविवार, 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूर्णिमा की चांदनी को आरोग्यता और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। इस अवसर पर गाय के दूध और शक्कर से बनी खीर को रात में खुले आसमान के नीचे चंद्रमा की रोशनी में रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। वहीं, स्नान-दान की पूर्णिमा 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन से कार्तिक मास के स्नान, दान, दीपदान और यम-नियम का आरंभ होगा।

पंडित दीपू महाराज ने काशी पंचांग एवं ऋषिकेश पंचांग के अनुसार बताया कि पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 10:40 बजे से शुरू होकर 26 अक्टूबर को सुबह 9:40 बजे तक रहेगी। रात्रि में पूजा-पाठ और चंद्रमा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का विशेष महत्व होने के कारण शरद पूर्णिमा का पर्व 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

खीर और चंद्रमा की चांदनी का विशेष महत्व
पंडित दीपू महाराज के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर शुद्ध गाय के दूध और शक्कर से तैयार खीर को खुले आकाश के नीचे चंद्रमा की चांदनी में रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि चांदनी में रखी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्यता, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता के कारण शरद पूर्णिमा को अमृत वर्षा का पर्व भी कहा जाता है।

26 अक्टूबर से कार्तिक मास के धार्मिक अनुष्ठान
कार्तिक मास को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष महत्व वाला माना जाता है। पंडित दीपू महाराज ने बताया कि इस दौरान प्रातःकाल स्नान, भगवान विष्णु की पूजा, रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन, तुलसी सेवा और दीपदान जैसे धार्मिक कर्मों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु इस अवधि में व्रत, उद्यापन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं।

उन्होंने बताया कि 26 अक्टूबर से कार्तिक मास के स्नान-दान की परंपरा शुरू होगी। 27 अक्टूबर से 24 नवंबर तक दीपदान सहित विभिन्न धार्मिक कर्म किए जाएंगे। महर्षि वाल्मीकि जयंती भी 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी।