गेवरा प्रबंधन के खिलाफ भूविस्थापित महिलाओं का ऐलान,आज सेअनिश्चितकालीन धरना

रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास के मुद्दों पर आर-पार की लड़ाई का निर्णय; नराईबोध समेत चार गांवों की महिलाएं महाप्रबंधक कार्यालय के गेट पर देंगी धरना

कोरबा। रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास सहित लंबित समस्याओं का निराकरण नहीं होने से एसईसीएल गेवरा क्षेत्र के भूविस्थापित परिवारों में असंतोष बढ़ रहा है। प्रबंधन पर बार-बार आश्वासन देने के बावजूद मांगें पूरी नहीं करने का आरोप लगाते हुए नराईबोध, मनगांव, रलिया और उमेंदीभांठा की प्रभावित महिलाओं ने आंदोलन का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया है। महिलाएं 12 अक्टूबर से गेवरा महाप्रबंधक कार्यालय के गेट पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू करने जा रही हैं।

इस संबंध में महाप्रबंधक को औपचारिक नोटिस भी सौंपा गया है।

प्रभावित महिलाओं का कहना है कि गांवों की समस्याओं और मांगों को लेकर वे पूर्व में कई बार प्रबंधन को पत्र लिख चुकी हैं। विभिन्न अवसरों पर आंदोलन के दौरान भी समस्याओं के शीघ्र निराकरण का लिखित और मौखिक आश्वासन दिया गया, लेकिन उनके अनुसार, अब तक ठोस समाधान नहीं हुआ है। इससे प्रभावित परिवारों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

खनन और ब्लास्टिंग से मकानों को नुकसान का आरोप
महिलाओं ने आंदोलन संबंधी नोटिस में आरोप लगाया है कि ग्रामसभा के प्रस्ताव, सहमति और पूर्व सूचना के बिना खुदाई की जा रही है। खदान में होने वाली ब्लास्टिंग से मकानों में दरारें पड़ने और उनके जर्जर होने की समस्या भी उठाई गई है। इसके अलावा, खदान से उड़ने वाली धूल और ब्लास्टिंग के कारण स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की बात कही गई है।

प्रभावितों के मुताबिक, स्थायी रोजगार, वैकल्पिक रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण मामले अब भी लंबित हैं। उनका आरोप है कि कोयला उत्पादन और उत्खनन पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन जिन ग्रामीणों की जमीन और जीवन खनन गतिविधियों से प्रभावित हुए हैं, उनकी समस्याओं के समाधान को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल रही है।

बसाहट तय नहीं होने से बेदखली का डर
भूविस्थापित महिलाओं ने पुनर्वास और नई बसाहट के निर्धारण में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बसाहट तय करने के बाद वहां सड़क, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाएं विकसित करने तथा प्रभावित परिवारों को भूखंड आवंटित करने में भी समय लगेगा। ऐसे में यदि समय रहते प्रक्रिया पूरी नहीं की गई तो परिवारों के सामने मकान छोड़ने और बेदखली जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

महिलाओं ने कुसमुंडा परियोजना के ग्राम जटराज में मकान तोड़े जाने की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे अन्य भूविस्थापित परिवारों में भी भय और असुरक्षा का माहौल है। उनका आरोप है कि पुनर्वास और नए मकान बनाने के लिए पर्याप्त समय दिए बिना मकान तोड़ने की कार्रवाई प्रभावित परिवारों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर डालती है।

छोटे खातेदारों और भूमिहीनों को वैकल्पिक रोजगार देने की मांग
रोजगार के मुद्दे पर भी प्रभावितों ने प्रबंधन की नीति पर सवाल उठाए हैं। महिलाओं का आरोप है कि कोल इंडिया की 2012 की नीति के तहत बड़े खातेदारों को रोजगार मिलने के कारण छोटे खातेदारों और भूमिहीन परिवारों के अनेक सदस्य रोजगार के अवसरों से वंचित रह गए हैं। ऐसे प्रभावितों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था भी नहीं की जा रही है।

ठेका कंपनियों में काम करने वाले ग्रामीणों को निर्धारित मजदूरी नहीं मिलने का आरोप भी लगाया गया है। महिलाओं के अनुसार, हाई पावर कमेटी द्वारा निर्धारित मजदूरी का भुगतान नहीं होने से श्रमिकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने रोजगार और मजदूरी से जुड़े मामलों का भी निराकरण करने की मांग उठाई है।

बैठक में बनी आंदोलन की रणनीति
लंबित समस्याओं को लेकर हुई बैठक में बड़ी संख्या में प्रभावित महिलाएं शामिल हुईं। बैठक में गोमती केवट, कलश बाई पटेल, पांचो बाई पटेल और इंद्रा सहित अन्य महिलाओं ने हिस्सा लिया। बैठक में मांगों को लेकर एकजुट होकर आंदोलन करने का निर्णय लिया गया।

महिलाओं ने 12 अक्टूबर से गेवरा महाप्रबंधक कार्यालय के गेट पर अनिश्चितकालीन धरना देने की सूचना प्रबंधन को दी है। आंदोलन के संबंध में खदान परिसर में धरना-प्रदर्शन का भी उल्लेख किया गया है। अब यह देखना होगा कि आंदोलन शुरू होने से पहले या उसके बाद प्रबंधन प्रभावित परिवारों की समस्याओं के निराकरण के लिए क्या कदम उठाता है।