बस्तर दशहरा की ‘कचिन गड़ी’ में आस्था के साथ दिखती है त्याग, प्रकृति और सामाजिक एकता की झलक
लेखिका: डॉ. अलका यादव
(जनजाति एवं लोक संस्कृति अध्येता, प्राचार्य, विष्णु कांति महाविद्यालय, लोरमी, मुंगेली छ.ग.)
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, लोक आस्था और देव परंपरा का जीवंत संगम है। इस ऐतिहासिक दशहरे की सबसे अनूठी और गूढ़ परंपरा है “कचिन गड़ी” – कांटों के झूले पर देवी को झुलाने की रस्म। दशहरे के दौरान धुरवा, मुरिया और पनिका जनजातियों के बीच कचिन गड़ी का विशेष महत्व है, जहां ग्रामदेवी को कांटों से निर्मित झूले पर बिठाकर गंभीर झूलाया जाता है। इसे स्थानीय भाषा में “कांटों का झूला” कहा जाता है, जो देवी को प्रसन्न करने और सुख, शांति और अच्छी फसल की कामना से जुड़ा है।
इस परंपरा में पनिका समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बस्तर दशहरा के दौरान पनिका समाज के लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों के गंभीर स्वर में गंभीर गीत गाते हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित देवी की पालकी, हथेली धज और कचिन गड़ी की व्यवस्था संभालते हैं। नौ पैर, पारंपरिक वेशभूषा में पनिका युवक कांटों के झूले को सुशोभित रूप से तैयार करते हैं और देवी की पूजा-अर्चना के बाद उन्हीं झूले पर बैठाकर गांव की परिक्रमा कराते हैं। माना जाता है कि देवी इस झूले पर सवार होकर गांव का भ्रमण करती हैं और समस्त बाधाओं को दूर करती हैं।
पनिका समुदाय की द्रविड़ मूल – पांच प्रमाण
1. भाषा एवं शब्दावली: पनिका समाज की बोली में द्रविड़ भाषाओं के शब्दों का प्रयोग मिलता है, जैसे ‘अम्मा’, ‘अप्पा’, ‘गोहरी’ जैसे संबोधन जो तेलुगु-कन्नड़ भाषाई प्रभाव को दर्शाते हैं।
2. लोकगीत और टोटेम परंपरा: पनिका समुदाय में नाग, बाघ और मोर को कुल देवता के रूप में पूजने की परंपरा है, जो द्रविड़ भारत की द्रविड़ जनजातियों में प्रचलित टोटेम पूजा से मेल खाती है।
3. देवी पूजा की पद्धति: पनिका समाज में ग्रामदेवी की पूजा शक्ति और प्रकृति पूजन के रूप में की जाती है, जिसमें पशुधन, ग्राम और जल की देवीयां मान्यता द्रविड़ संस्कृति का लक्षण है।
4. सामाजिक संरचना: पनिका समाज में मातृसत्तात्मक झुकाव और गोत्र व्यवस्था द्रविड़ समाज के समान है, जहां वंश माता के गोत्र से चलाने जाते हैं।
5. ऐतिहासिक व सांस्कृतिक साक्ष्य: स्थानीय लोककथाओं और मौखिक परंपरा में पनिकाओं का उल्लेख दक्षिण भारत के प्रवास कर बसने वाले समुदाय के रूप में मिलता है, जो 10-12वीं शताब्दी में द्रविड़ समूहों के बस्तर आगमन को दर्शाता है।
मातृसत्तात्मक झुकाव और गोत्र व्यवस्था द्रविड़ द्रविड़ समाज के समान है, जहां वंश माता के गोत्र से चलाया जाता है।
“पश्चाताप सांस्कृतिक साक्ष्य: स्थानीय लोककथाओं और मौखिक परंपरा में पनिकाओं का उल्लेख दक्षिण भारत के प्रवास कर बसने वाले समुदाय के रूप में मिलता है, जो 10-12वीं शताब्दी में द्रविड़ समूहों के बस्तर आगमन को दर्शाता है। जुड़े विश्वास का प्रतीक माना जाता है। कचिन गड़ी केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। इस दिन पनिका, गोंड, हल्बा और अन्य समुदाय एक साथ मिलकर सामूहिक एकता का प्रतीक भी है। इस दिन पनिका, गोंड, हल्बा और अन्य समुदाय एक साथ मिलकर सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।

डॉ. अलका यादव के अनुसार, “कचिन गड़ी परंपरा हमें बताती है कि कैसे आदिवासी समुदाय ने प्रकृति, देवी आस्था और सामाजिक समरसता का अनूठा संगम सहेजा है। पनिका समुदाय की द्रविड़ मूल की पहचान बस्तर की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध करती है।”
कचिन गड़ी के प्रमुख तत्व
· कांटों से बना झूला – प्रतीक त्याग व आस्था
· देवी पूजा – ग्रामदेवी/देवस्थानी देवी
· सामूहिक नृत्य – धुरवा और पनिका लोकनृत्य
· उद्देश्य – अच्छी फसल व ग्राम रक्षा
यह आलेख लोकसंस्कृति और जनजातीय अध्ययन पर आधारित है। विचार लेखिका के व्यक्तिगत हैं।
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