सात करोड़ की नहर पर सवाल! निर्माण पूरा होने से पहले ही धंसने लगी दीवारें

मानसनगर से सुनालिया पुल तक चल रहे नहर निर्माण में दरारें और टूटती कंक्रीट ने खोली गुणवत्ता की पोल? बारिश में बढ़ सकती है परेशानी

कोरबा। शहर में जल संसाधन विभाग द्वारा करीब 7 करोड़ रुपये की लागत से मानसनगर नहर से सुनालिया पुल तक कराए जा रहे नहर मरम्मत एवं निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हैरानी की बात यह है कि निर्माण कार्य अभी पूरा भी नहीं हुआ है और कई स्थानों पर नहर की दीवारों में दरारें पड़ने, कंक्रीट की परत टूटने तथा संरचना के कुछ हिस्सों के धंसने की स्थिति सामने आ रही है। इससे निर्माण कार्य में गुणवत्ता एवं तकनीकी मानकों के पालन को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो गया है।

मौके से सामने आई तस्वीरों में नहर की दीवारों पर जगह-जगह दरारें और टूटी हुई कंक्रीट दिखाई दे रही है।

कुछ हिस्सों में दीवार के नीचे की जमीन खिसकती नजर आ रही है, जबकि ऊपरी हिस्से में मिट्टी का कटाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। निर्माणाधीन संरचना की शुरुआती बारिश में ही ऐसी स्थिति सामने आने से सवाल उठ रहा है कि निर्माण के दौरान सामग्री की गुणवत्ता और तकनीकी प्रक्रिया की पर्याप्त निगरानी हुई या नहीं।

बारिश बढ़ाएगी चुनौती, कमजोर हिस्सों पर खतरा
इन दिनों लगातार बारिश के कारण नहर में पानी का दबाव बढ़ने की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में पहले से कमजोर दिखाई दे रहे हिस्सों के और क्षतिग्रस्त होने की आशंका है। यदि दीवारों की मजबूती प्रभावित होती है तो नहर की सुरक्षा के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र में भी परेशानी बढ़ सकती है।

जानकारों के अनुसार नहर जैसे निर्माण कार्य में बेस की मजबूती, मिट्टी की कंपेक्शन, जल निकासी, कंक्रीट की गुणवत्ता और निर्धारित डिजाइन एवं तकनीकी मानकों का पालन बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में निर्माण पूरा होने से पहले ही क्षति सामने आना इन सभी पहलुओं की जांच की जरूरत को रेखांकित करता है।

ठेका और पेटी ठेकेदारी को लेकर भी सवाल
विभागीय जानकारी के अनुसार इस कार्य का ठेका विष्णु अग्रवाल से संबंधित बताया जा रहा है। वहीं मौके पर कार्य पेटी ठेकेदार के माध्यम से कराए जाने की चर्चा भी है।

हालांकि, पेटी ठेकेदार की वास्तविक भूमिका, निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता और कार्य की तकनीकी निगरानी को लेकर जल संसाधन विभाग की ओर से आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है।

ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि करोड़ों रुपये के कार्य की गुणवत्ता की निगरानी के लिए विभागीय अधिकारियों द्वारा मौके पर कितनी नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है।

सिर्फ लीपापोती नहीं, हो तकनीकी जांच
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि जल संसाधन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी तत्काल मौके का निरीक्षण करें और नहर की क्षतिग्रस्त संरचना की स्वतंत्र एवं तकनीकी जांच कराई जाए। जांच में निर्माण सामग्री, बेस की मजबूती, कंक्रीट की गुणवत्ता, मिट्टी की कंपेक्शन और अन्य तकनीकी मानकों की जांच की जाए।

लोगों का कहना है कि यदि किसी हिस्से में निर्माण संबंधी कमी पाई जाती है तो केवल ऊपर से मरम्मत कर मामले को निपटाने के बजाय कमजोर हिस्से को निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुसार दोबारा मजबूत किया जाना चाहिए।

करीब 7 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रही यह नहर शहर की महत्वपूर्ण जल संरचनाओं में शामिल है। ऐसे में निर्माण पूरा होने से पहले ही क्षति के संकेत मिलना गंभीर विषय है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जल संसाधन विभाग मौके की जांच कर गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की वास्तविकता सामने लाता है या नहीं, और यदि लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई की जाती है।