मेरई में सड़क नहीं, मुसीबत की पगडंडी!

गड्ढों, कीचड़ और कटाव के बीच ग्रामीणों का रोजाना सफर, स्कूली बच्चों की राह भी जोखिम भरी

सरपंच से ग्राम सभा तक गुहार बेअसर, मुरुम के भरोसे ग्रामीण; DMF और विकास के दावों पर उठे सवाल

कोरबा। शहर की सड़कों पर एक-दो गड्ढे नजर आते ही जिम्मेदारों की नींद टूट जाती है। शिकायतें होती हैं, निरीक्षण होता है और मरम्मत की कवायद शुरू हो जाती है। लेकिन गांव की सड़क अगर पूरी तरह गड्ढों, कीचड़ और बारिश के कटाव में तब्दील हो जाए, तो क्या उसकी तकलीफ दिखाई नहीं देती? ग्राम पंचायत मेरई की बदहाल सड़क कुछ ऐसा ही सवाल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने खड़ा कर रही है।

ठाकुरदिया पारा, गौटिया पारा, छिनपानी और माझापारा को जोड़ने वाला यह मार्ग इन दिनों सड़क कम और मुसीबत ज्यादा नजर आ रहा है। बारिश के पानी के तेज बहाव ने जगह-जगह सड़क को काट दिया है। गहरे गड्ढे, दलदल और कीचड़ के कारण पैदल चलना तक मुश्किल हो गया है। बाइक और साइकिल से गुजरना तो किसी जोखिम से कम नहीं।

बच्चों के लिए रोज का सफर बना खतरा
इस बदहाल रास्ते का सबसे गंभीर पहलू यह है कि इसी मार्ग से स्कूली बच्चे भी रोजाना आवाजाही करते हैं। बारिश में सड़क पर फिसलन और कटाव के चलते कभी भी दुर्घटना हो सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सड़क की मरम्मत नहीं हुई तो किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद टूटेगी?

वर्षों पुरानी समस्या, हर बार सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों के अनुसार मेरई की यह सड़क वर्षों से कच्ची है। बरसात आते ही इसकी हालत और बिगड़ जाती है। सड़क पर मुरुम डालकर तत्काल राहत देने की मांग ग्रामीण कई बार सरपंच के समक्ष रख चुके हैं। ग्राम सभा में भी समस्या उठाई गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक ठोस परिणाम सामने नहीं आया।

ग्रामीणों का कहना है कि मुरुम डालकर रास्ते को अस्थायी रूप से चलने योग्य बनाना कोई बड़ी मांग नहीं है, फिर भी इसके लिए बार-बार गुहार लगानी पड़ रही है। सवाल यही है कि आखिर ग्रामीणों को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए और कितने साल इंतजार करना होगा?

DMF की राशि और गांव की सड़क के बीच इतना फासला क्यों?
कोरबा जिले में विकास कार्यों के लिए जिला खनिज न्यास (DMF) समेत विभिन्न मदों से पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने की बात कही जाती है। सड़क, नाली, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर लगातार विकास के दावे भी किए जाते हैं। ऐसे में मेरई की सड़क की तस्वीर उन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है।

यदि शहरों की सड़कों के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं बन सकती हैं, तो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की ऐसी जरूरी सड़कों के लिए प्राथमिकता क्यों तय नहीं हो सकती? विकास का पैमाना सिर्फ शहर की चमकती सड़कें नहीं, बल्कि उन गांवों की स्थिति भी होनी चाहिए जहां आज भी बरसात में लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है।

चुनाव में गांव तक पहुंचने वाले कदम बरसात में क्यों रुक जाते हैं?
ग्रामीणों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि चुनाव के समय गांव-गांव पहुंचकर समस्याएं सुनने वाले जनप्रतिनिधि बरसात में इन बदहाल रास्तों की सुध लेने क्यों नहीं पहुंचते? चुनावी मौसम में विकास के वादे और बरसात में सड़क की वास्तविक तस्वीर के बीच का अंतर आखिर कब खत्म होगा?
मेरई की सड़क सिर्फ एक रास्ते की बदहाली नहीं है।

यह इस बात की परीक्षा है कि विकास की योजनाओं का लाभ वास्तव में अंतिम छोर तक पहुंच रहा है या नहीं।

ग्रामीणों की मांग फिलहाल साफ है बारिश के दौरान तत्काल मुरुम डालकर मार्ग को आवागमन योग्य बनाया जाए और स्थायी समाधान के लिए पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए।