गौवंश की मौत पर जवाबदेही तय हो, टैगिंग से लेकर उपचार तक बने ठोस व्यवस्था

सड़क हादसों में रौंदे जा रहे मवेशियों को लेकर गौशाला संचालक ने उठाए सवाल, ‘राज्य संरक्षित पशु’ का दर्जा देने की मांग

कोरबा। छत्तीसगढ़ में गौवंश संरक्षण के लिए कानून और योजनाएं होने के बावजूद सड़कों पर मवेशियों की मौत और घायल होने की घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं।

कोरबा-दर्री मार्ग के नए पुल पर हाल ही में 17 मवेशियों की मौत और घायल होने की घटना के बाद गौवंश की सुरक्षा, पशुपालकों की जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

कोरबा के एक गौशाला संचालक ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए सवाल उठाया कि यदि किसी पशु के साथ क्रूरता होती है तो कानून के तहत कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन सड़क दुर्घटना में गाय की मौत होने, किसी वाहन से गौवंश के कुचलने, करंट लगने या लावारिस हालत में पशु की मौत होने पर जिम्मेदारी तय करने की स्पष्ट व्यवस्था क्या है?

उनका कहना है कि केवल बैठकों और निर्देशों से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि गौवंश की सुरक्षा के लिए जन्म से मृत्यु तक जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था जरूरी है।

टैगिंग से तय हो सकती है पशुपालक की जिम्मेदारी

गौशाला संचालक का सुझाव है कि प्रत्येक गौवंश को यूनिक टैग नंबर से जोड़कर उसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए। इसमें पशु के मालिक, स्थान, नस्ल, उम्र, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दर्ज हो। इससे सड़क पर लावारिस या मृत अवस्था में मिलने वाले पशु के मालिक की पहचान आसानी से हो सकेगी।

टैगिंग व्यवस्था से चोरी और अवैध परिवहन पर नियंत्रण के साथ-साथ दुर्घटना के मामलों की जांच भी आसान हो सकती है। यदि सड़क पर टैगयुक्त गौवंश मृत मिलता है तो उसके मालिक की पहचान तत्काल की जा सकती है। वाहन की टक्कर से मौत होने की स्थिति में पुलिस और पशुपालन विभाग के लिए जांच आगे बढ़ाना भी आसान होगा।

संदिग्ध मौत पर हो जांच और पोस्टमार्टम

गौवंश की संदिग्ध मौत के मामलों में पशु चिकित्सक से जांच और आवश्यकता के अनुसार पोस्टमार्टम की व्यवस्था अनिवार्य करने का सुझाव भी दिया गया है। इससे दुर्घटना, बीमारी, करंट, लापरवाही अथवा जानबूझकर की गई हिंसा के कारणों को स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है।

गौशालाओं के लिए भी टैगिंग व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है। इससे यह पता चल सकेगा कि गौशाला में कितने पशु हैं, कितने नए पशु पहुंचे, कितनों की मृत्यु हुई और कितने अन्य स्थानों पर भेजे गए। सरकारी सहायता मिलने की स्थिति में वास्तविक पशु संख्या का सत्यापन भी संभव होगा।

पशु को लावारिस छोड़ने वालों की जिम्मेदारी तय हो

गौवंश को सड़कों पर छोड़ने की समस्या को लेकर भी सख्त व्यवस्था की मांग उठ रही है। पशुपालक अपने पशुओं को लावारिस छोड़ देते हैं और यही मवेशी कई बार सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। टैगिंग से पशु के मालिक की पहचान होने के बाद लापरवाही की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

राज्य संरक्षित गौवंश’ की अलग श्रेणी की मांग

गौशाला संचालकों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में गौवंश को कृषि पशु की कानूनी श्रेणी में रखा गया है। उनका सुझाव है कि गौवंश के लिए अलग से ‘राज्य संरक्षित पशु’ की श्रेणी बनाई जाए अथवा मौजूदा कानून में अलग अध्याय जोड़कर जीवन-सुरक्षा, पहचान, चिकित्सा, परिवहन, दुर्घटना और मृत्यु की जांच से जुड़े स्पष्ट प्रावधान किए जाएं।

उनका कहना है कि केवल गौवंश के वध या अवैध परिवहन पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। सड़क दुर्घटना, लावारिस हालत, बीमारी और अन्य कारणों से होने वाली मौतों के मामलों में भी स्पष्ट प्रक्रिया और जवाबदेही जरूरी है।

दर्जा देने के साथ बजट और व्यवस्था भी जरूरी

गौवंश को विशेष दर्जा देने की चर्चा के बीच यह भी कहा जा रहा है कि किसी भी प्रकार का दर्जा केवल सम्मान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसके साथ पर्याप्त बजट, गौशालाओं के लिए सहायता, पशु चिकित्सा सुविधा, टैगिंग, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, दुर्घटना सहायता और मृत्यु की जांच जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित की जानी चाहिए।

गौशाला संचालक का कहना है कि गौवंश संरक्षण केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का विषय भी है। कानून कितना है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि कानून और संरक्षण व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है। जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक गौवंश की पहचान और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था ही वास्तविक संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है।