16 साल पुराने अपहरण-दुष्कर्म मामले में अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर दोषमुक्त

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा की निरस्त,कहा अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित करने में रहा असफल

कोरबा। वर्ष 2009 के बहुचर्चित अपहरण, दुष्कर्म और धोखाधड़ी मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने तत्कालीन पुलिस उप निरीक्षक अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर को दोषमुक्त कर दिया है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि एवं सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर सका। अदालत ने पीड़िता की गवाही में कई महत्वपूर्ण विरोधाभासों को भी रेखांकित किया।

हाईकोर्ट ने 10 दिसंबर 2025 को अपना फैसला सुनाया था। इसके साथ ही अन्य आरोपियों को पहले ही बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार की अपील भी अदालत ने खारिज कर दी।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
मामले में सत्र न्यायालय कोरबा ने 19 मार्च 2012 को अमृतलाल केरकेट्टा को आईपीसी की धारा 376(1) के तहत 7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। वहीं आशु राठौर को धारा 420 के तहत 1 वर्ष तथा धारा 376(1)/109 के तहत 7 वर्ष के कारावास की सजा दी गई थी।

नौकरी का झांसा देकर ले जाने का था आरोप
अभियोजन की कहानी के अनुसार पीड़िता को नौकरी दिलाने का भरोसा देकर आशु राठौर उसे अपने साथ ले गया था। आरोप था कि इस दौरान उसका एटीएम कार्ड और जेवर भी लिए गए। बाद में उसे बिलासपुर ले जाया गया, जहां अमृतलाल केरकेट्टा पर जबरन यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद पीड़िता को कोरबा, सक्ती और रायगढ़ ले जाने तथा धमकाकर रखने के आरोप भी लगाए गए थे।

पीड़िता की गवाही में विरोधाभास को माना अहम
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता के बयान का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पीड़िता ने प्रारंभ में अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर के पक्ष में शपथपत्र एवं बयान दिए थे। उस समय उसने माता-पिता से परेशान होकर नौकरी की तलाश में बिलासपुर जाने की बात कही थी।

बाद में माता-पिता एवं रिश्तेदारों के थाने पहुंचने के बाद उसने आरोपियों के खिलाफ बयान दिया। अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि पीड़िता कई स्थानों पर आरोपियों के साथ गई और कई मौकों पर उसे शिकायत करने का अवसर मिला, लेकिन उसने तत्काल किसी से शिकायत नहीं की। उसने आशु राठौर से फोन पर बातचीत भी की, लेकिन अपने माता-पिता से संपर्क नहीं किया।

ATM कार्ड और मेडिकल रिपोर्ट भी रहे अहम
अदालत ने एटीएम कार्ड की बरामदगी को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति माना। रिकॉर्ड के अनुसार कार्ड पीड़िता से नहीं, बल्कि उसके पिता से जब्त हुआ था। इसके अलावा पुलिस रिकॉर्ड में पीड़िता के घर से जाने की तारीख को लेकर भी विरोधाभास सामने आया।

मेडिकल परीक्षण में डॉक्टर को पीड़िता के शरीर पर बाहरी अथवा आंतरिक चोट नहीं मिली थी। हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य समेत इन परिस्थितियों को पीड़िता की गवाही में मौजूद अन्य विरोधाभासों के साथ देखते हुए अभियोजन के मामले का परीक्षण किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने Santosh Prasad और Vipin @ Lalla मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन ऐसी गवाही न्यायालय का पूर्ण विश्वास अर्जित करने वाली होनी चाहिए।

अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामले में पीड़िता की गवाही तथा उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य अभियोजन की कहानी को उचित संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इसी आधार पर अदालत ने अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर की दोषसिद्धि एवं सजा को निरस्त करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया। वहीं अन्य आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य की अपील भी खारिज कर दी गई।

फैसले के बाद अमृतलाल केरकेट्टा और आशु राठौर ने इसे “सत्य की जीत” बताया है।