सख्त पात्रता शर्तों से ठेकेदार लॉबी में हलचल, सचिव की भूमिका और विभागीय फैसलों पर उठे सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में करीब ₹4500 करोड़ से अधिक की सिंचाई परियोजनाओं के टेंडर इन दिनों चर्चा में हैं। सिकासार-कोडार, मटनार-देवरगांव और सिरपुर बैराज जैसी बड़ी परियोजनाओं में टेंडर की शर्तों को लेकर विवाद सामने आया है। विभाग मुख्यमंत्री के पास होने के कारण पूरे मामले की राजनीतिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता भी बढ़ गई है।
बताया जा रहा है कि विभाग ने इस बार निविदाओं में अनुभव, तकनीकी योग्यता और वित्तीय क्षमता से जुड़े मानकों को पहले की तुलना में अधिक सख्त रखा है। इसी के बाद ठेकेदारों और विभागीय स्तर पर खींचतान की चर्चा शुरू हुई। सवाल उठ रहे हैं कि सख्त पात्रता शर्तों से आखिर किन संभावित दावेदारों के रास्ते प्रभावित हुए हैं।
पिछली परियोजनाओं ने बढ़ाई चिंता
जल संसाधन विभाग की कुछ पुरानी परियोजनाओं की धीमी प्रगति और गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। अरपा-भैंसाझार परियोजना में निर्धारित अवधि के बाद भी काम पूरा नहीं होने तथा अपेक्षित सिंचाई लाभ नहीं मिलने का मामला सामने आ चुका है। इसी तरह केलो परियोजना को लेकर भी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में परियोजना प्रबंधन और नहर नेटवर्क से संबंधित कमियां दर्ज की गई थीं।
हरदीडीह एनीकट की संरचना को नुकसान पहुंचने के बाद निर्माण गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठे थे। ऐसे में विभाग द्वारा नई बड़ी परियोजनाओं के लिए केवल न्यूनतम बोली लगाने वाले L-1 ठेकेदार के बजाय तकनीकी एवं वित्तीय क्षमता को महत्व देने की नीति को इन पुराने अनुभवों से जोड़कर देखा जा रहा है।
टेंडर से सचिव की कुर्सी तक पहुंची चर्चा
सिकासार-कोडार सहित बड़ी परियोजनाओं के टेंडर में कड़े नियम लागू होने के बाद विवाद केवल निविदा प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहने की चर्चा है। विभागीय सूत्रों में विभिन्न ठेकेदारों, प्रभावशाली लोगों और विभागीय स्तर पर सक्रिय समूहों के नामों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इसी बीच जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश कुमार टोप्पो की भूमिका भी चर्चा में आई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि टेंडर प्रक्रिया में सख्ती के कारण कुछ हित प्रभावित हुए और इसके बाद सचिव को हटाने या उनके खिलाफ शिकायतों का सिलसिला तेज हुआ। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित शिकायतों, नोटशीट और विभागीय दस्तावेजों का सार्वजनिक होना जरूरी है।
बैठक और अधिकार को लेकर भी सवाल
जल संसाधन विभाग से जुड़े एक पूर्व जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा विभागीय बैठक किए जाने की चर्चा ने भी सवाल खड़े किए हैं। बताया जा रहा है कि बैठक में लंबे समय से संविदा व्यवस्था में कार्यरत एक अधिकारी की मौजूदगी भी थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बैठक किस अधिकार और किस एजेंडे के तहत आयोजित की गई थी।
यदि बैठक का आदेश, एजेंडा और कार्यवाही विवरण सार्वजनिक किए जाएं तो यह स्पष्ट हो सकता है कि बैठक सामान्य प्रशासनिक समन्वय का हिस्सा थी अथवा किसी विशेष परियोजना से संबंधित निर्णयों पर चर्चा हुई थी।
सिकासार-कोडार मामला हाईकोर्ट पहुंचा
सिकासार-कोडार परियोजना की निविदा शर्तों को लेकर विवाद न्यायालय तक भी पहुंच चुका है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद टेंडर प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस को नया मोड़ मिला है। अब निविदा शर्तों की वैधानिकता और विभाग के फैसलों की प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में है।
पारदर्शिता से ही दूर होंगे सवाल
जल संसाधन विभाग के सामने चुनौती सिर्फ हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की नहीं, बल्कि पूरी निविदा प्रक्रिया को पारदर्शी और विवादरहित रखने की भी है। इतनी बड़ी राशि से जुड़ी परियोजनाओं में पात्रता के मानक, टेंडर दस्तावेज, आपत्तियां, बैठक की कार्यवाही और लिए गए निर्णय सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट किए जाने से कई सवालों का जवाब मिल सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सख्त टेंडर नॉर्म्स से किन हितों पर असर पड़ा और मामला निविदा की शर्तों से निकलकर सचिव की कुर्सी तक कैसे पहुंचा? इन सवालों का अंतिम जवाब विभागीय दस्तावेजों और आधिकारिक जांच से ही सामने आएगा।
Editor – Niraj Jaiswal
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