कोरबा। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्त गति का दर्दनाक आईना है। बचपन में ही पिता का साया उठ गया। मां कलिन्द्री यादव (सीतामढ़ी मूल) ने मजदूरी करके चार बेटियों सिम्मी, स्नेहा, मुस्कान और आस्था को संभालने की पूरी कोशिश की। लेकिन 1 अप्रैल 2018 को आए भीषण आंधी-तूफान ने वह आखिरी सहारा भी छीन लिया। कच्चे घर का छज्जा गिरा और उसके नीचे दबकर मां की मौत हो गई। उस दिन से चारों नाबालिग बहनों का बचपन जैसे थम सा गया।
मां के जाने के बाद घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा। स्कूल की किताबों से ज्यादा चिंता अब दो वक्त की रोटी की हो गई। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के सहारे जैसे-तैसे दिन कट रहे हैं, लेकिन भविष्य अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है।
पीड़ित बहनों ने बताया कि आपदा राहत राशि के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी, लेकिन मामला वर्षों तक फाइलों में उलझा रहा। मदद कभी जमीन पर नहीं उतरी।
अब, घटना के लगभग सात वर्ष बाद, चारों बहनों ने कलेक्टर कुणाल दुदावत से मुलाकात की और अपनी व्यथा सुनाई।
कलेक्टर ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एसडीएम को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। फाइल दोबारा खुल गई है।
लेकिन इन मासूमों की नजरें अब कागजी कार्रवाई पर नहीं, बल्कि वास्तविक सहायता पर टिकी हैं। यह कहानी राहत राशि से कहीं ज्यादा है यह उस संवेदना की है, जिसकी हर अनाथ बच्चे को समाज और शासन से अपेक्षा होती है।
अब देखना यह है कि इन चार आंखों में जलती उम्मीद कब हकीकत में बदलती है।
स्थानीय लोग और परिजन प्रशासन से अपील कर रहे हैं कि इस संवेदनशील मामले को प्राथमिकता पर लेते हुए जल्द से जल्द सहायता पहुंचाई जाए।
Editor – Niraj Jaiswal
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