बालको की फ्लाई एश आवंटन पर उठे सवाल, सलिहाभांठा खदान भराई को लेकर ‘हाई लेवल संपर्क’ की चर्चा

कोरबा जिले में फ्लाई एश के आवंटन को लेकर फिर से सियासी-सामाजिक हलचल तेज हो गई है। इस बार विवाद दिलीप बिल्डकॉन की सलिहाभांठा गिट्टी खदान से जुड़ा है, जिसकी क्षमता करीब 10 लाख घन मीटर है। इस खदान को भरने के लिए बालको से बड़ी मात्रा में फ्लाई एश (कोयले की राख) का प्रस्ताव है, जिसे अब स्थानीय स्तर पर “सफेद सोना” कहा जाने लगा है।

निर्माण कार्यों और खदान भराई में फ्लाई एश की मांग बढ़ने से कई बड़े कारोबारी सक्रिय हो गए हैं। स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि पर्यावरणीय नियमों, अनुमतियों और प्रक्रियाओं की बाध्यताओं के बावजूद इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए हाई लेवल संपर्कों और दबाव का सहारा लिया जा रहा है।

जब भी नियमों या प्रक्रियागत अड़चनों का जिक्र होता है, तो विभागीय अधिकारियों को एक ही जवाब मिलता है “ऊपर से बात हो चुकी है”। यह वाक्य पूरे मामले की अनौपचारिक सच्चाई बयां कर रहा है। आरोप है कि फाइलें अब नियमों से नहीं, बल्कि फोन कॉल्स और “संकेतों” से आगे बढ़ रही हैं।

पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित नियमों के तहत फ्लाई एश के उपयोग, परिवहन और निस्तारण के स्पष्ट दिशानिर्देश हैं।

सवाल यह है कि क्या ये नियम सभी के लिए बराबर लागू हो रहे हैं, या “हाई लेवल सिफारिश” वालों के लिए अलग राह बनाई जा रही है। कोरबा में फ्लाई एश आवंटन की यह कहानी पुरानी है, लेकिन इस बार यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि सत्ता बदलती है, लेकिन कोरबा में फ्लाई एश का “खेल” नहीं बदलता। प्राथमिकता उसी को मिलती है, जिसकी “ऊपर” तक पहुंच मजबूत हो।

जब तक आवंटन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और सार्वजनिक मानकों पर आधारित नहीं होगी, तब तक “ऊपर से बात हो चुकी है” जैसी बातें ही यहां की अनकही नीति बनी रहेंगी।

इस मामले में आगे क्या संस्तुतियां की जा रही हैं और किस स्तर पर दबाव काम कर रहा है, यह देखना बाकी है।

पर्यावरण संरक्षण और निष्पक्ष आवंटन के मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है।