विकास की रफ्तार के साथ बढ़ता प्रदूषण,कोरबा की आबोहवा पर सवाल

कोरबा। ऊर्जा उत्पादन और कोयला खनन के क्षेत्र में देश की प्रमुख औद्योगिक पहचान रखने वाले कोरबा में विकास के साथ प्रदूषण की चुनौती भी बनी हुई है। ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला उत्सर्जन, खदानों में कोयले की खुदाई, कोयला हैंडलिंग, राख का प्रबंधन और भारी वाहनों की आवाजाही वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

औद्योगिक गतिविधियों के बीच शहर और आसपास की बस्तियों की आबोहवा पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर प्रदूषण नियंत्रण के उपायों और उनकी निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।

आईआईटी खड़गपुर के वर्ष 2024 के स्रोत-आकलन अध्ययन का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से संबंधित दस्तावेज में औद्योगिक उत्सर्जन को कोरबा में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा योगदानकर्ता बताया गया है। वहीं, अप्रैल 2026 के एक दस्तावेज में पीएम-10 का स्तर 65 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया, जबकि राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। यह आंकड़ा संबंधित दस्तावेज में उद्धृत माप का है, वर्तमान समय की लाइव रीडिंग नहीं। इसके बावजूद यह औद्योगिक क्षेत्र में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण के उपायों की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

खदानों से सड़कों तक, धूल और उत्सर्जन की चुनौती
गेवरा, कुसमुंडा और दीपका जैसे बड़े कोयला खनन क्षेत्रों में खनन, कोयले की ढुलाई और भारी वाहनों की लगातार आवाजाही होती है। इन गतिविधियों से उड़ने वाली धूल आसपास के इलाकों की वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में खदानों से जुड़ी सड़कों की स्थिति, धूल नियंत्रण, कोयले के सुरक्षित परिवहन और आसपास की बस्तियों में प्रदूषण की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है।

ताप विद्युत संयंत्रों में उत्सर्जन नियंत्रण, राख के सुरक्षित प्रबंधन और पर्यावरणीय मानकों के पालन की भी अहम भूमिका है। औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण के स्रोत अनेक होने के कारण केवल आंकड़े दर्ज करना पर्याप्त नहीं, बल्कि निगरानी के निष्कर्षों के आधार पर समयबद्ध कार्रवाई भी जरूरी है।

पेनाल्टी का खेल आखिर कब तक?
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय मध्यप्रदेश विद्युत मंडल (एमपीईबी) द्वारा कोरबा में स्थापित 100 और 240 मेगावाट क्षमता वाले बिजलीघर लंबे समय तक विद्युत उत्पादन में शामिल रहे। बाद में ये दोनों संयंत्र बंद हो गए।

इनके बंद होने के कारणों और इसमें पर्यावरणीय कार्रवाई की भूमिका को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड का परीक्षण जरूरी है।

वर्तमान में कोरबा जिले में एनटीपीसी, सीएसईबी, बालको और निजी क्षेत्र की बिजली परियोजनाएं संचालित हैं। इन सभी के लिए बिजली उत्पादन के साथ पर्यावरणीय मानकों का पालन करना भी अनिवार्य है। उत्सर्जन नियंत्रण, राख के प्रबंधन और प्रदूषण की निगरानी में लापरवाही सामने आने पर संबंधित प्रबंधन के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

विभिन्न मौकों पर पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन को लेकर लगाए गए जुर्माने यह सवाल भी खड़ा करते हैं कि क्या आर्थिक दंड से प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण हो पा रहा है।

जुर्माना लगाने के साथ उल्लंघन की पुनरावृत्ति रोकना, सुधारात्मक कदमों की निगरानी करना और नियमों का लगातार पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

कोरबा की औद्योगिक पहचान बिजली और कोयला उत्पादन से जुड़ी है, लेकिन इसके साथ नागरिकों के स्वच्छ हवा में सांस लेने के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती।

सवाल यही है कि विकास और ऊर्जा उत्पादन की जरूरतों के बीच पर्यावरणीय जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी और प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों का लाभ आम लोगों तक कब पहुंचेगा।