नवरात्र-दीपावली की तैयारी तेज, कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार

मिट्टी के दीयों की बढ़ी मांग, पुश्तैनी कारोबार को त्योहारों से रोजगार की उम्मीद

कोरबा। नवरात्र और दीपावली के पर्व में अब ज्यादा समय शेष नहीं है। त्योहारों की तैयारियों के साथ ही कोरबा शहर सहित जिलेभर में मिट्टी के दीये और दीपमालिकाएं बनाने का काम जोर पकड़ने लगा है। कुम्हार एवं प्रजापति समाज के परिवार दिन-रात मेहनत कर चाक पर मिट्टी को आकार देने में जुटे हैं। त्योहार नजदीक आने के साथ बाजार में मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग बढ़ने की उम्मीद है।

कोरबा के सीतामढ़ी सहित विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले प्रजापति समाज के अनेक परिवार आज भी अपने पुश्तैनी व्यवसाय को जीवित रखे हुए हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर दीये गढ़ने, उन्हें सुखाने और भट्ठी में पकाने तक की पूरी प्रक्रिया में परिवार के सदस्य मिलकर काम कर रहे हैं।

नवरात्र और दीपावली की आहट के साथ कारीगरों की व्यस्तता भी बढ़ गई है।

पारंपरिक कारोबार को मिल रही राहत
प्रजापति समाज के लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मिट्टी लाने पर रॉयल्टी नहीं लिए जाने तथा मिट्टी से तैयार होने वाले पारंपरिक उत्पादों को कर संबंधी राहत मिलने से उन्हें काफी सुविधा हुई है। उनका कहना है कि इससे पुश्तैनी कारोबार से जुड़े परिवारों को अपना काम जारी रखने और आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।

बाजार में आर्टिफिशियल दीये, इलेक्ट्रिक लाइट और विभिन्न प्रकार के सजावटी सामानों की उपलब्धता बढ़ने के बावजूद दीपावली पर मिट्टी के पारंपरिक दीयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है। धार्मिक आस्था और परंपरा के कारण बड़ी संख्या में लोग आज भी घरों, दुकानों, प्रतिष्ठानों और मंदिरों में मिट्टी के दीये जलाना पसंद करते हैं।

नवरात्र में भी मिलती है अच्छी मांग
कुम्हार समाज के अनुसार दीपावली के दौरान जिले में बड़ी संख्या में मिट्टी के दीयों की बिक्री होती है। वहीं नवरात्र में भी सामान्य आकार से लेकर बड़े आकार के मिट्टी के दीपकों की मांग रहती है। विशेष रूप से अखंड ज्योति के लिए बड़े दीपक उपयोग में लाए जाते हैं। ऐसे में कारीगरों को दीपावली के साथ नवरात्र में भी काम और आमदनी का अवसर मिलता है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रशासन और भाजपा द्वारा आयोजित सेवा संकल्प अभियान के विभिन्न कार्यक्रमों में भी बड़ी संख्या में मिट्टी के दीयों का उपयोग किया गया था। इससे स्थानीय कुम्हार एवं प्रजापति समाज के कारीगरों को अतिरिक्त काम मिला। बड़ी संख्या में दीयों के ऑर्डर और बिक्री से कारीगरों के चेहरे पर भी खुशी नजर आई।

चाक की घूमती रफ्तार में रोशन भविष्य की उम्मीद
पारंपरिक कला और पुश्तैनी व्यवसाय को जीवित रखने वाले प्रजापति समाज के कारीगरों को इस वर्ष नवरात्र और दीपावली में अच्छी बिक्री की उम्मीद है। त्योहारों के करीब आते ही मांग बढ़ने लगी है और इसका असर कुम्हारों के चाक पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पूरा परिवार मिट्टी को आकार देकर दीयों की कतार तैयार करने में जुटा है।

उनके हाथों से आकार ले रहे ये मिट्टी के दीपक न केवल घर-आंगन रोशन करने की तैयारी में हैं, बल्कि पुश्तैनी हुनर और पारंपरिक रोजगार की लौ को भी जलाए रखने की उम्मीद जगा रहे हैं।