38 डिसमिल जमीन रिकॉर्ड में 52.40 डिसमिल कैसे? नेशनल हाईवे से लगी बेशकीमती जमीन के रकबे पर उठे सवाल

कोरबा। पाली राजस्व अनुविभाग में शिव मंदिर के समीप और नेशनल हाईवे से लगी जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में रकबे का अंतर सामने आने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार खसरा नंबर 278/3 के पुराने मिसल रिकॉर्ड में भूमि का रकबा 38 डिसमिल दर्ज बताया जा रहा है, जबकि वर्तमान ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड में इससे जुड़े उपखसरों का कुल रकबा 0.2120 हेक्टेयर यानी 52.40 डिसमिल दिखाई दे रहा है। इस तरह पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड में 14.40 डिसमिल का अंतर सामने आ रहा है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित जमीन शिव मंदिर के पास और नेशनल हाईवे से लगी बताई जा रही है। ऐसे क्षेत्र में भूमि के रकबे में अंतर को लेकर मूल राजस्व अभिलेखों और बटांकन से संबंधित दस्तावेजों का मिलान जरूरी हो जाता है।

बटांकन के बाद कैसे बढ़ गया कुल रकबा?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक खसरा नंबर 278/3 के मूल मिसल रिकॉर्ड में 38 डिसमिल भूमि दर्ज है। बाद में इस भूमि से संबंधित बटांकन हुए और अलग-अलग उपखसरे अस्तित्व में आए। वर्तमान रिकॉर्ड में 278/3 से 278/14 तक विभिन्न उपखसरों में अलग-अलग रकबे दर्ज बताए जा रहे हैं।

इन रकबों को जोड़ने पर कुल क्षेत्रफल 0.2120 हेक्टेयर यानी 52.40 डिसमिल बताया जा रहा है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यही है कि यदि मूल रकबा 38 डिसमिल था तो बटांकन के बाद संबंधित उपखसरों का कुल रकबा 52.40 डिसमिल कैसे दर्ज हुआ। 14.40 डिसमिल अतिरिक्त रकबा किस आधार पर रिकॉर्ड में आया, इसका जवाब बटांकन आदेश और मूल अभिलेखों के मिलान से ही स्पष्ट हो सकेगा।

इन नामों पर दर्ज बताए जा रहे उपखसरे
उपलब्ध विवरण के अनुसार खसरा 278/3 में गजेन्द्र कुमार चंद्रा, 278/4 में श्रीचंद सिरुमल पारवानी, प्रकाश पारवानी और नीरज पारवानी, 278/5 में भोगीलाल वल्द रणमल, 278/6 में प्रशांत मिश्रा, 278/7 में पुनीराम पटेल, 278/8 में सीमा गुप्ता, 278/9 में श्रीमती शशि शर्मा, 278/10 में अजय जायसवाल, 278/11 में चिन्टू अग्रवाल, 278/12 में ईश्वरी जायसवाल, 278/13 में संजय अग्रवाल और 278/14 में अंजली चौरसिया के नाम दर्ज बताए जा रहे हैं।

हालांकि इस मामले में मुख्य सवाल संबंधित खातेदारों के नाम से ज्यादा बटांकन के दौरान हुए रकबे के गणित को लेकर है। प्रत्येक बटांकन में मूल रकबा कितना था, कितनी भूमि अलग की गई और बटांकन के बाद कितना रकबा शेष रहा इन सभी का क्रमवार मिलान होने पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

किस दस्तावेज के आधार पर बढ़ा रकबा?
रिकॉर्ड में अंतर के पीछे कई संभावनाएं हो सकती हैं। पुराने रिकॉर्ड में प्रविष्टि की त्रुटि, बाद में हुए सुधार, भूमि सीमा में परिवर्तन, किसी दूसरे खसरे की भूमि का समायोजन या बटांकन के दौरान हुई प्रविष्टि इनमें से वास्तविक कारण क्या है, यह मूल दस्तावेजों की जांच के बाद ही सामने आएगा।

यदि वर्तमान रिकॉर्ड में 52.40 डिसमिल रकबा विधिवत दर्ज हुआ है तो उसके आधार में मौजूद बटांकन आदेश, राजस्व प्रकरण और संबंधित अभिलेख सामने आना जरूरी है। वहीं यदि ऑनलाइन रिकॉर्ड में किसी स्तर पर प्रविष्टि संबंधी त्रुटि हुई है तो उसके सुधार की प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।

मूल अभिलेखों के मिलान से साफ होगी तस्वीर
नेशनल हाईवे से लगी जमीन होने के कारण इस मामले में 14.40 डिसमिल का अंतर महज तकनीकी आंकड़ा नहीं माना जा सकता। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज मूल रकबे से लेकर प्रत्येक बटांकन और वर्तमान ऑनलाइन प्रविष्टि तक दस्तावेजों का क्रमवार मिलान ही यह स्पष्ट करेगा कि 38 डिसमिल भूमि का कुल रकबा 52.40 डिसमिल कैसे दर्ज हुआ।

ऐसे में संबंधित राजस्व अभिलेखों, बटांकन आदेशों और वर्तमान रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक किया जाना जरूरी है, ताकि रिकॉर्ड को लेकर उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब सामने आ सके।