कोरबा:धान खरीदी के बीच तिरपाल खरीदी में बड़ा घोटाला? बाजार भाव से दोगुने बिल का आरोप, 65 केंद्रों में लाखों की अनियमितता की आशंका

कोरबा। धान खरीदी प्रक्रिया के बीच उठे मूसवा कांड की गूंज थमी भी नहीं थी कि अब तिरपाल (तालपत्री) खरीदी को लेकर नया विवाद सामने आ गया है। आरोप है कि जिले के करीब 65 धान उपार्जन केंद्रों में भेजी गई 60×60 साइज की तिरपालों के बिल बाजार दर से लगभग दोगुनी कीमत पर बनाए गए हैं। यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है तो बड़े स्तर पर वित्तीय अनियमितता उजागर होने की संभावना जताई जा रही है।

पड़ताल में सामने आया है कि संबंधित धान खरीदी सोसायटियों को जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, कोरबा की ओर से तिरपाल भेजी गईं। इनके साथ मारुति ट्रेडर्स, किशन एग्रो, समृद्धि और मां दुर्गा (रायपुर व दुर्ग) के नाम से बिल एवं विभिन्न जिलों के कोटेशन की प्रतियां संलग्न बताई गई हैं।

समिति प्रबंधकों का कहना है कि प्रत्येक तिरपाल का बिल लगभग 10,500 से 12,000 रुपये तक दर्शाया गया है, जबकि स्थानीय बाजार और रायपुर में इसी आकार की तिरपाल 5,500 से 6,000 रुपये में उपलब्ध है।

नाम न छापने की शर्त पर एक सहकारी सेवा समिति प्रबंधक ने बताया कि प्रत्येक केंद्र में 4 से 10 तिरपाल भेजी गईं, जिनकी कुल कीमत 55 हजार से लेकर लाखों रुपये तक दिखाई गई है। आरोप है कि बैंक की ओर से भुगतान के लिए दबाव भी बनाया जा रहा है।

यदि बाजार दर और बिल राशि के अंतर की गणना की जाए तो प्रति केंद्र हजारों रुपये का फर्क सामने आता है, जो 65 केंद्रों में मिलाकर लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। तिरपाल का उपयोग बारिश के दौरान धान को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है, लेकिन खरीद प्रक्रिया और मूल्य निर्धारण को लेकर उठे सवालों ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जीएसटी सहित 5 से 6 हजार रुपये लागत वाली सामग्री का बिल 12 हजार रुपये तक दर्शाए जाने के आरोप गंभीर वित्तीय गड़बड़ी की ओर संकेत कर रहे हैं। हालांकि इस मामले में अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

जानकारों का मानना है कि यदि जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग निष्पक्ष जांच कराते हैं तो खरीद प्रक्रिया, कोटेशन चयन और भुगतान अनुमोदन से जुड़ी परतें खुल सकती हैं। अब देखना होगा कि इस कथित अनियमितता पर ठोस कार्रवाई होती है या मामला भी अन्य विवादों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाता है।