दीपावली पर सुआ नृत्य की धूम, महिलाएं बिखेर रही हैं लोक संस्कृति की छटा

कोरबा। दीपावली के त्योहारी मौसम में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति गांव-गांव में जीवंत हो उठी है। कोरबा के गांवों में महिलाएं और बच्चियां पारंपरिक वेशभूषा में सजकर सुआ नृत्य के माध्यम से समृद्धि और सामाजिक एकता का संदेश दे रही हैं। ढोलक की थाप और गीतों की गूंज के साथ गांव उत्साह और उमंग से सराबोर हैं।

सुआ नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है। इस नृत्य में महिलाएं मिट्टी के तोते (सुआ) को धान से भरी टोकरी में रखकर उसके चारों ओर गोल घेरा बनाती हैं और ताली बजाते हुए पारंपरिक गीत, जैसे “सुआ नाचे गली गली, महके फुलवारी आज,” गाती हैं। ये गीत प्रकृति, फसल और समाज के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

यह परंपरा फसल कटाई की खुशियों को साझा करने के साथ-साथ सामाजिक एकता को भी मजबूत करती है।