वह पहले आध्यात्मिक नेता थे जिन्होंने जोर देकर कहा कि शूद्रों का जमाना आने वाला है . भविष्य का भारत शूद्रों का होगा . जाति के नाम पर विवेकानंद को प्रायः उपालम्भ सुनने को मिलते थे . उनके बारे में कहा गया कि धर्मशास्त्रों का उन्हें पर्याप्त ज्ञान नहीं है . और सनातनी हिन्दू परंपरा में उन्हें तो इसका अधिकार भी नहीं है . विदेश यात्रा के दौरान उन पर अभक्ष्य खाने के आरोप लगे . उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की . उन्होंने कहा -‘ मैं एक परम्परानिष्ठ पुराणपंथी हिन्दू था ही कब ? मैंने धर्मशास्त्रों को ध्यान से पढ़ा है और जानता हूँ कि आध्यात्म और धर्म शूद्रों केलिए है ही नहीं . अगर कोई शूद्र विदेश यात्रा के दौरान खान -पान के बंदिशों का पालन करता है तो भी उसे कोई श्रेय नहीं मिलने वाला . ऐसी सारी कोशिशें बेकार हैं . मैं शूद्र हूँ और म्लेच्छ हूँ . फिर मुझे ऐसी बातों की चिंता क्यों होने लगी ? ‘ ‘
वह विवेकानंद ही थे ,जिन्होंने अमेरिका में गर्व से अपने को हिन्दू कहा और भारत में ब्राह्मणों के समक्ष गर्व से अपने को शूद्र और म्लेच्छ कहा . आरएसएस और भाजपा उनकी एक उक्ति का तो इस्तेमाल करती है ,लेकिन दूसरी का नहीं .
कुल मिला कर वह एक विद्रोही व्यक्ति थे . उन्होंने धर्म के क्षेत्र में प्रवेश किया ,लेकिन उसके अर्थ को बदलने की कोशिश की . उन्होंने नफरत और अलगाव के नहीं , ज्ञान और विवेक के विस्तार की कोशिश की . उन्होंने अपने समय में ही उस साइंटिफिक टेम्पर पर जोर दिया था ,जिसे बाद में जवाहरलाल नेहरू ने अपनाया . उन्होंने हमेशा आस्था के बजाय विवेक पर जोर देने की बात की . छुआछूत ,पाखण्ड और पुरोहितवाद की उन्होंने बार -बार धज्जियाँ उड़ाई हैं . हिंदुत्व पर उनका जोर था ,लेकिन सभी धर्मों का वह सम्मान करना चाहते थे . उनके लिए उनका हिन्दू होना शर्मिंदगी की बात नहीं थी . अपने भारतीय और हिन्दू होने पर उन्होंने गर्व अनुभव किया . लेकिन दूसरों को नीच नहीं माना . ईसाइयत ,इस्लाम और बौद्ध धर्म के महत्व को उन्होंने रेखांकित किया है
सामाजिक -राजनैतिक स्तर पर एक सशक्त भारत उनका स्वप्न था . दुखद है कि उनका सांप्रदायिक ताकतों द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा रहा है . आरएसएस उन्हें विकृत रूप में रखने की निरंतर कोशिश में लगा है .उनका हिन्दू सावरकर के हिन्दू से अलग है ,जैसे फुले और गाँधी का हिन्दू है . विवेकानंद की संगत फुले ,गाँधी ,अम्बेडकर के साथ बनती है; न कि सावरकर और हेडगेवार के साथ . उनमे कुछ अंतर्विरोध अवश्य थे ,लेकिन कुल मिला कर वह वाकई युवा चेतना के प्रतीक विद्रोही व्यक्तित्व हैं . मात्र 39 साल के जीवन में उन्होंने समाज और इतिहास पर अमिट लकीर खींच दी है।
उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृति को नमन
डॉ अलका यादव
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